विदिशा भारती डेस्क
शैलेन्द्र चौधरी
पठारी । मध्य प्रदेश की पावन धरा विदिशा ऐतिहासिक और पौराणिक रहस्यों की खान है। इसी अंचल के पठारी नगर के पास स्थित ग्राम पंचायत वड़ोह का बड़ी माता मंदिर आज समूचे क्षेत्र में गहरी आस्था और कौतूहल का केंद्र बना हुआ है। यहां विराजीं सिंह वाहिनी महामाई का विग्रह केवल प्राचीन ही नहीं, बल्कि अप्रतिम दैवीय चमत्कारों से परिपूर्ण है। मंदिर में स्थापित बीस भुजाधारी देवी की प्रतिमा दिन के पहरों के साथ तीन अलग-अलग रूपों में नजर आती है। इसके साथ ही मंदिर प्रांगण में पिछले दो दशकों (20 वर्षों) से निरंतर प्रज्वलित हो रही अखंड ज्योति भक्तों के आकर्षण और विश्वास का प्रमुख आधार बनी हुई है।
महाभारत काल से जुड़ा इतिहास: पांडवों ने अज्ञातवास में की थी स्थापना
इतिहासकार मनोज नामदेव के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का एक महत्वपूर्ण समय विदिशा जिले के पठारी अंचल के वनों में व्यतीत किया था। इसी अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपनी साधना, शक्ति संचय और विपत्तियों से रक्षा के लिए सिंह वाहिनी महामाई की प्राण प्रतिष्ठा की थी। गहन वन क्षेत्र में स्थापित इस दिव्य विग्रह के समक्ष पांडवों ने कठोर तपस्या कर शक्ति की उपासना की थी। यही कारण है कि यह स्थान केवल एक साधारण देवालय नहीं, बल्कि सदियों पुरानी तपोभूमि माना जाता है।
दिन में तीन रूप बदलती हैं बीस भुजाधारी देवी
वड़ोह के बड़ी माता मंदिर का सबसे बड़ा और विस्मयकारी रहस्य महामाई के दर्शन का स्वरूप है। पश्चिम मुखी यह बीस भुजाधारी प्रतिमा दिन के अलग-अलग प्रहर में भक्तों को अलग स्वरूप में दर्शन देती है:
सुबह का पहर: भोर की प्रथम किरण के साथ माता रानी का मुखमंडल एक अबोध और कोमल शिशु (बाल्यावस्था) के रूप में दिखाई देता है।
दोपहर का पहर: दोपहर होते-होते देवी के चेहरे पर तेज, आभा और यौवन का निखार आ जाता है, मानो शक्ति अपने पूर्ण युवा रूप में विराजमान हों।
संध्या और रात्रि पहर: गोधूलि बेला और रात्रि की आरती के समय देवी का स्वरूप एक गंभीर, ममतामयी और शांत वृद्धावस्था जैसा प्रतीत होता है।
स्थानीय निवासियों और साधकों का कहना है कि यह दिव्य चमत्कार वर्ष भर महसूस होता है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में माता का यह रूप परिवर्तन बिल्कुल स्पष्ट और प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
पश्चिम मुखी प्रतिमा का विशेष महत्व:
बगलामुखी साधना समान फल
धर्मशास्त्रों, वेदों और ज्योतिष के मर्मज्ञों के अनुसार, सामान्यतः देवी मंदिरों के मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होते हैं, लेकिन वड़ोह स्थित बड़ी माता मंदिर में देवी पश्चिम मुखी हैं। तंत्र और आगम शास्त्रों में पश्चिम मुखी शक्ति की आराधना को दस महाविद्याओं में से एक, मां बगलामुखी की उपासना के समकक्ष माना गया है। ऐसी मान्यता है कि पश्चिम मुखी देवी के दरबार में सच्ची श्रद्धा से हाजिरी लगाने वाले साधकों के समस्त गुप्त व प्रत्यक्ष शत्रु परास्त होते हैं, मुकदमे व संकट कटते हैं और भय का निवारण होता है। यही कारण है कि दूर-दराज के जिलों से भी तंत्र साधक और आम श्रद्धालु यहां मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।
20 वर्षों से निरंतर जल रही अखंड ज्योति, 5 वर्षों से फिर गूंज रहा अखंड रामायण पाठ
मंदिर से जुड़ा एक और प्रमुख आकर्षण यहां की अखंड ज्योति है, जो बीते 20 वर्षों से बिना बुझे अनवरत जल रही है। मंदिर समिति के सदस्य अजब सिंह कुशवाहा ने बताया कि इस अखंड ज्योति की स्थापना करीब दो दशक पहले सिंह वाहिनी के तत्कालीन पुजारी पवन दास जी महाराज ने अखंड रामायण पाठ के अनुष्ठान के साथ की थी।शुरुआती दौर में लगातार 11 वर्षों तक यहां बिना रुके अखंड रामायण पाठ चला। इसके बाद जब पवन दास जी महाराज किसी अन्य तीर्थ स्थल के लिए प्रस्थान कर गए, तब कुछ समय के लिए यह अखंड पाठ स्थगित रहा। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों, धर्मप्रेमियों और नवगठित समिति के अटूट संकल्प ने पांच वर्ष पूर्व इस परंपरा को फिर से जीवित कर दिया। अब बीते पांच वर्षों से मंदिर परिसर में चौबीसों घंटे रामायण की पावन चौपाइयों का गान निरंतर जारी है।
40 समर्पित सदस्यों की टोली संभाल रही व्यवस्था
आज इस सिद्ध पीठ का संचालन और सेवा कार्य किसी एक व्यक्ति के भरोसे नहीं, बल्कि लगभग 40 समर्पित ग्रामीणों और समिति के सदस्यों की मजबूत टीम द्वारा किया जा रहा है। मंदिर के मुख्य पुजारी विष्णु दीक्षित, शिवप्रसाद कुशवाहा, प्रीतम सिंह कुशवाहा, ऋषि कुमार दीक्षित, बृजेंद्र राजपूत, ओंकार दीक्षित, कल्लू दीक्षित और शुरवेंद्र राजपूत सहित समिति के सभी 40 सदस्य बारी-बारी से सेवा देते हैं। अखंड ज्योति में घी-तेल की निरंतर व्यवस्था से लेकर अखंड रामायण के अनवरत वाचन तक, हर जिम्मेदारी गांव के लोग खुद अपनी श्रद्धा से निभाते हैं।
नवरात्रि में उमड़ता है जनसैलाब
हर वर्ष चैत्र और शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर पठारी और वड़ोह का यह अंचल देवी भक्ति के रंग में रंग जाता है। नौ दिनों तक यहां विशेष हवन, शतचंडी अनुष्ठान, कन्या भोज और भजन संध्याओं का आयोजन होता है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से बीस भुजाधारी महामाई के दरबार में नारियल बांधकर मन्नत मांगता है, उसकी हर मनोकामना माता रानी अवश्य पूर्ण करती हैं।
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