रीवा,मध्य प्रदेश।
क्या सफेद बाघों की धरती अब परमाणु विकिरण के साये में जीने को मजबूर होगी? रीवा के सिरमौर (रोझौही) में प्रस्तावित 28,000 करोड़ रुपये के टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर अब विरोध की मशाल जल चुकी है। हाल ही में आयोजित एक राष्ट्रीय वेबिनार में देश के नामचीन परमाणु विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने इस प्रोजेक्ट को लेकर जो खुलासे किए हैं, उसने न केवल सरकार के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि स्थानीय जनजीवन के लिए खतरे की घंटी भी बजा दी है।
पावर या पेरिल: परमाणु ऊर्जा का असली चेहरा
'आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप इंडिया' द्वारा आयोजित 307वें राष्ट्रीय वेबिनार का विषय था— 'फ्रॉम पावर टू पेरिल: अंडरस्टैंडिंग न्यूक्लियर रिस्क्स'। कार्यक्रम का सफल संयोजन प्रसिद्ध सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया। विशेषज्ञों ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिस बिजली के नाम पर जनता को सुनहरे सपने दिखाए जा रहे हैं, उसकी हकीकत चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी तबाही से भरी हो सकती है।
विशेषज्ञों की दहाड़: “परमाणु ऊर्जा एक अभिशाप”
वेबिनार में तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु विरोधी आंदोलन के प्रणेता सुब्रमण्यम उदयकुमार ने हिस्सा लिया। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, "परमाणु ऊर्जा न तो सुरक्षित है, न ही स्वच्छ। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक आत्मघाती कदम है।" उन्होंने सरकार द्वारा निजी कंपनियों को परमाणु क्षेत्र में लाने वाले 2025 के नए शांति विधेयक की भी आलोचना की।
गुजरात के पर्यावरणविद महेश पांड्या और रजनी भाई दवे ने तकनीकी पक्ष रखते हुए बताया कि जब देश की कुल ऊर्जा का मात्र 3 से 4 प्रतिशत हिस्सा ही परमाणु आधारित है, तो सरकार करोड़ों जिंदगियों को खतरे में क्यों डाल रही है? उन्होंने सवाल उठाया कि सौर और पवन ऊर्जा जैसे सुरक्षित विकल्पों को छोड़कर 'विनाशकारी' परमाणु रिएक्टरों पर जोर क्यों दिया जा रहा है?
रीवा की जमीन पर तबाही का 'टाटा' प्लान?
रीवा के क्योटी-रोझौही क्षेत्र की 167 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित इस प्लांट को लेकर प्रवीण पटेल (संयोजक, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस) ने गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट विकास नहीं, बल्कि स्थानीय आदिवासियों और गरीबों के विस्थापन, लाइलाज बीमारियों और जल प्रदूषण का निमंत्रण है।
वेबिनार की मुख्य बातें:
विकिरण का खतरा: चेरनोबिल और फुकुशिमा की तरह परमाणु विकिरण हजारों सालों तक जमीन और आने वाली पीढ़ियों को बीमार बना सकता है।
पारदर्शिता का अभाव: उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने बताया कि परमाणु ऊर्जा के नाम पर सरकार सुरक्षा कारणों का हवाला देकर आरटीआई के तहत जानकारी छिपाती है।
वैकल्पिक ऊर्जा: विशेषज्ञों ने जोर दिया कि भारत को सौर (Solar) और ज्वारीय (Tidal) ऊर्जा पर ध्यान देना चाहिए जो पूरी तरह सुरक्षित और सस्ती हैं।
क्या रीवा बनेगा दूसरा भोपाल?
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने भोपाल गैस त्रासदी का उदाहरण देते हुए आगाह किया कि औद्योगिक दुर्घटनाएं कभी बताकर नहीं आतीं। रीवा में प्रस्तावित प्लांट के रेडिएशन से न केवल मानव जीवन, बल्कि जल स्रोत और पर्यावरण भी खत्म हो जाएंगे। छत्तीसगढ़ के आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र अग्रवाल ने भी साइट चयन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए।
बड़े आंदोलन की आहट: 'मेधा पाटकर' को भी जोड़ने की तैयारी
वेबिनार में यह तय हुआ कि इस विनाशकारी परियोजना के खिलाफ अब चुप नहीं बैठा जाएगा। सुब्रमण्यम उदयकुमार और शिवानंद द्विवेदी की टीम ने एक संयुक्त ज्ञापन तैयार करने और आगामी दिनों में रीवा में एक विशाल जन-आंदोलन और रैली निकालने की रणनीति बनाई है। इस आंदोलन में प्रसिद्ध समाजसेविका मेधा पाटकर को भी आमंत्रित करने पर सहमति बनी है।
विकास की चमक के पीछे छिपे परमाणु खतरे को अब रीवा पहचान चुका है। 28 हजार करोड़ का निवेश रोजगार लाएगा या विनाश, यह बहस अब सड़कों पर उतरने वाली है।
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