नई दिल्ली। धर्म परिवर्तन और आरक्षण की पात्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को झटका देते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने के आधार पर कोई व्यक्ति तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। <Cite refs={["turn600660news12","turn600660search2"]}/>
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पीके मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की। अदालत ने तमिलनाडु सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या हिंदू सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति के इस्लाम अपनाने के बाद उसे तमिलनाडु की पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर नए धर्म में किसी विशेष पिछड़े समुदाय का दर्जा स्वतः प्राप्त नहीं किया जा सकता। केवल धर्म बदल लेना किसी व्यक्ति को संबंधित मुस्लिम पिछड़े समुदाय का सदस्य नहीं बना देता। <Cite refs={["turn600660news13","turn600660search2"]}/>
तमिलनाडु सरकार के आदेश पर क्यों उठा विवाद?
तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया था। इसके तहत पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को निर्धारित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी।
इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने 25 जून 2026 को सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। <Cite refs={["turn600660search0","turn600660search3","turn600660search2"]}/>
मुस्लिम पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र से जुड़ा था मामला
यह विवाद समीर अहमद नामक याचिकाकर्ता से जुड़े मामले के बाद सामने आया। उन्होंने हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने के बाद तमिलनाडु में मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त करने का प्रयास किया था, ताकि पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ लिया जा सके।
प्रशासन की ओर से प्रमाणपत्र नहीं दिए जाने के बाद मामला अदालत पहुंचा। मद्रास हाईकोर्ट ने संबंधित सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट में भी यही सवाल प्रमुख रहा कि क्या केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा समुदाय का सदस्य माना जा सकता है। <Cite refs={["turn600660search0","turn600660search3","turn600660search2"]}/>
अनुसूचित जाति और OBC आरक्षण में अंतर समझना जरूरी
इस फैसले को समझते समय अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की पात्रता के बीच अंतर करना आवश्यक है। अनुसूचित जाति का दर्जा संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के प्रावधानों से जुड़ा है, जबकि पिछड़ा वर्ग की पात्रता संबंधित राज्य की अधिसूचित समुदाय सूची और लागू नियमों पर निर्भर करती है।
इसलिए फैसले का अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि धर्म परिवर्तन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति हर प्रकार के आरक्षण से स्वतः वंचित हो जाता है। इस मामले में अदालत ने तमिलनाडु की पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर शामिल किए जाने के दावे पर निर्णय दिया है। अन्य परिस्थितियों में पात्रता का निर्धारण संबंधित कानूनों और लागू नियमों के अनुसार होगा। <Cite refs={["turn600660news16","turn600660search3"]}/>
आरक्षण और धर्म परिवर्तन पर फिर चर्चा तेज
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से धर्म परिवर्तन, सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण की कानूनी पात्रता को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है। निर्णय में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी व्यक्ति की पूर्व धार्मिक-सामाजिक पहचान के आधार पर उसे दूसरे धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े समुदाय में स्वतः शामिल नहीं किया जा सकता।
तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज होने के बाद मद्रास हाईकोर्ट का आदेश प्रभावी बना रहेगा। इस फैसले का व्यावहारिक महत्व उन मामलों में है, जहां धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र और उससे जुड़े आरक्षण लाभ का दावा किया जाता है।
विदिशा भारती | देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें।
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