विदिशा भारती डेस्क
पठारी । बीना नदी पर बने महत्वाकांक्षी हनोता बांध परियोजना के डूब क्षेत्र से विस्थापित होकर गौड़खेड़ी कॉलोनी में बसे ग्रामीणों का दर्द सुनने प्रशासनिक अमला जमीन पर उतरा। कुरवाई एसडीएम मोतीलाल अहिरवार ने विस्थापित बस्ती का दौरा कर नागरिकों की समस्याएं सुनीं। निरीक्षण के दौरान रहवासियों ने मकानों के बिल्कुल नजदीक बनाए जा रहे श्मशान घाट को लेकर कड़ा विरोध जताया और इसे तत्काल बस्ती से दूर स्थानांतरित करने की मांग उठाई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एसडीएम ने मौके से ही पठारी तहसीलदार प्रेमलता पाल को निर्देशित किया कि वे तत्काल स्थल निरीक्षण कर श्मशान के लिए आबादी से दूर उपयुक्त सरकारी जमीन चिन्हित करें।
डूब से उजड़े, अब बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे विस्थापित ::
पठारी तहसील के अंतर्गत आने वाली बीना नदी की हनोता डैम परियोजना में अपनी पुरखों की जमीन और आशियाने गंवा चुके विस्थापित परिवारों को गौड़खेड़ी में बसाया गया था। पुनर्वास नीति के तहत इन परिवारों को कई सुनहरे सपने दिखाए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बदहाली की दास्तान बयां कर रही है। विस्थापित कॉलोनी में न तो पक्की सड़कों की मुकम्मल व्यवस्था है और न ही जल निकासी का ठोस प्रबंध।
इसी बीच प्रशासन द्वारा रिहायशी मकानों की दहलीज के ठीक सामने श्मशान घाट निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। अपने आशियानों के सामने जलती चिताओं की कल्पना मात्र से कॉलोनी के लोग खौफजदा और आक्रोशित हो उठे। बस्ती के लोगों ने साफ तौर पर कहा कि वे विस्थापन का दंश झेल रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि उनके घरों के आंगन को ही मरघट में बदल दिया जाए।
घरों के सामने श्मशान घाट पर फूटा रहवासियों का गुस्सा :
एसडीएम मोतीलाल अहिरवार जैसे ही प्रशासनिक काफिले के साथ गौड़खेड़ी विस्थापित कॉलोनी पहुंचे, बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और बुजुर्ग एकत्र हो गए। ग्रामीणों ने एक सुर में अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि जहां लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ रह रहे हैं, ठीक उसी के नजदीक श्मशान घाट का निर्माण कराया जा रहा है।
ग्रामीणों ने तर्क दिया:
बच्चों और बुजुर्गों के मानस पर बुरा असर: घरों के ठीक सामने दिन-रात शवों का अंतिम संस्कार होने से बस्ती के बच्चों और परिवारों में भय और नकारात्मकता का माहौल बनेगा।
धुआं और पर्यावरण प्रदूषण: अंतिम संस्कार के दौरान उठने वाला धुआं सीधे घरों की खिड़कियों और आंगनों में भरेगा, जिससे बुजुर्गों और श्वास रोगियों का जीना मुहाल हो जाएगा।
सामाजिक और धार्मिक असुविधा: शादी-ब्याह और अन्य मांगलिक आयोजनों के समय घरों के बिल्कुल पास श्मशान का होना सामाजिक रूप से बेहद असहज और अनुचित है।
नागरिकों ने पुरजोर मांग रखी कि श्मशान घाट का निर्माण आबादी क्षेत्र से कम से कम 500 से 800 मीटर की सुरक्षित दूरी पर किया जाए, जहां पर्याप्त पानी, छाया और पहुंच मार्ग उपलब्ध हो।
एसडीएम ने दी समझाइश, प्रोजेक्ट अफसरों से चर्चा का भरोसा :
नागरिकों की तीखी प्रतिक्रिया और वास्तविक पीड़ा को सुनकर एसडीएम मोतीलाल अहिरवार ने संवेदनशीलता दिखाई। उन्होंने लोगों को शांत कराते हुए आश्वस्त किया कि प्रशासन किसी भी सूरत में जनभावनाओं और सुरक्षा के विपरीत काम नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि हनोता डैम के प्रोजेक्ट अधिकारियों से इस बाबत तकनीकी चर्चा की जाएगी और श्मशान घाट निर्माण स्थल को रिहायशी दायरे से हटाकर दूसरी जगह शिफ्ट कराया जाएगा। एसडीएम ने मौके पर ही मौजूद अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा कि विस्थापित परिवारों की बुनियादी सुविधाओं के साथ कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा। जल निकासी, नियमित बिजली आपूर्ति और पहुंच मार्ग की समस्याओं का भी चरणबद्ध समाधान निकाला जाएगा।
पठारी तहसीलदार को तत्काल जमीन तलाशने का फरमान
विवाद को तूल पकड़ने से रोकने और ग्रामीणों को त्वरित राहत देने के लिए एसडीएम ने पठारी तहसीलदार प्रेमलता पाल को कड़े दिशा-निर्देश जारी किए। उन्होंने निर्देशित किया कि तहसीलदार स्वयं राजस्व अमले (पटवारी और आरआई) के साथ गौड़खेड़ी कॉलोनी के आसपास का मौका-मुआयना करें।
तहसीलदार को सरकारी और शासकीय चरनोई जमीन का रिकॉर्ड खंगालकर आबादी से बाहर ऐसी सुरक्षित भूमि चिन्हित करने को कहा गया है, जहां श्मशान घाट का शांतिपूर्ण और व्यवस्थित निर्माण हो सके। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि प्रस्तावित नई जमीन तक पहुंचने के लिए पक्का या व्यवस्थित पहुंच मार्ग भी सुलभ हो, ताकि बरसात के दिनों में अंतिम यात्रा ले जाने में किसी को परेशानी का सामना न करना पड़े।
क्या कहते हैं विस्थापित ग्रामीण?
गौड़खेड़ी विस्थापित कॉलोनी के प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्होंने देश के विकास और सिंचाई परियोजना के लिए अपने खेत-खलिहान और पुराने घर त्याग दिए। शासन का दायित्व है कि नई कॉलोनी में उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का माहौल दे। यदि प्रशासनिक आश्वासन के बाद भी श्मशान निर्माण कार्य को घरों के पास से नहीं रोका गया, तो वे लामबंद होकर तहसील और जिला मुख्यालय पर धरना देने के लिए मजबूर होंगे। हालांकि एसडीएम की पहल और तहसीलदार को दिए गए स्पष्ट आदेशों के बाद ग्रामीणों में समस्या के स्थायी समाधान की उम्मीद जरूर जगी है।
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