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दसलक्षण धर्म के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म पर हुआ प्रवचन

20-09-2026  Vidisha Raghvendra dangi  22 views
दसलक्षण धर्म के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म पर हुआ प्रवचन

विदिशा। शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर किले अंदर में चल रहे दसलक्षण धर्म पर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म मनाया गया। इस अवसर पर धार्मिक प्रवचन, स्वाध्याय, भक्ति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने धर्म के मर्म को समझते हुए आत्मा और शरीर के बीच भेद-विज्ञान के महत्व को जाना।

मंदिर के प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि वीले पार्ले, मुंबई से आए विद्वान पं. संयम शास्त्री द्वारा समयसार नाटक ग्रंथ पर मार्मिक स्वाध्याय कराया जा रहा है। प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि कुंदकुंद आचार्य का समयसार 415 गाथाओं वाला परमागम ग्रंथ है और आत्मकल्याण के मार्ग में इसका विशेष महत्व है।

उन्होंने कहा कि अक्सर व्यक्ति व्रत, पूजा और उपवास जैसी बाहरी धार्मिक क्रियाओं को ही धर्म मानकर संतुष्ट हो जाता है, जबकि धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मस्वरूप की पहचान करना है। इसके लिए साधक को अपने भीतर यह भाव विकसित करना चाहिए कि मैं आत्मा हूं और शरीर, कर्म, धन तथा परिवार मुझसे भिन्न हैं। इसी चिंतन को भेद-विज्ञान बताया गया।

अभ्यास से मजबूत होता है आत्मचिंतन

प्रवचन में भेद-विज्ञान को समझाते हुए कहा गया कि शुरुआत में साधक को बार-बार विकल्प के रूप में यह चिंतन करना पड़ता है कि मैं आत्मा हूं। इसे बच्चे के लिखना सीखने के उदाहरण से समझाया गया। जिस तरह बच्चा पहली बार अक्षर लिखते समय गलती करता है, लेकिन लगातार अभ्यास से उसकी लिखावट बेहतर होती जाती है, उसी तरह आत्मा और शरीर के भेद का निरंतर अभ्यास धीरे-धीरे धारणा को मजबूत करता है।

आगे चलकर यही अभ्यास आत्मानुभूति की दिशा में ले जाता है। प्रवचन में बताया गया कि पूजा और स्वाध्याय के दौरान उत्पन्न होने वाला शुभ राग भी जड़ प्रकृति का है। धर्म का उद्देश्य केवल क्रिया करना नहीं, बल्कि धार्मिक क्रिया के दौरान भी उसके वास्तविक स्वरूप को समझना है।

प्रवचन में कहा गया कि राग के समय ज्ञान रहना स्वाभाविक है, लेकिन ज्ञान के समय राग का बने रहना जरूरी नहीं। इसी अंतर को भेद-विज्ञान के माध्यम से समझने का प्रयास किया गया।

किसान के उदाहरण से समझाया आत्मानुभूति का मार्ग

आत्मानुभूति और भेद-विज्ञान को समझाने के लिए किसान का उदाहरण दिया गया। बताया गया कि किसान को आम का फल प्राप्त करना होता है, लेकिन वह सीधे फल को पानी नहीं देता। वह पेड़ की जड़ में पानी डालता है और समय के साथ फल अपने आप प्राप्त होता है।

इसी तरह आत्मानुभूति और वीतरागता को फल तथा भेद-विज्ञान को उसकी जड़ बताया गया। जब साधक निरंतर आत्मस्वरूप का चिंतन करता है और मोह के बंधनों को समझने का प्रयास करता है, तब आत्मानुभूति की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है।

उत्तम सत्य धर्म का बताया आध्यात्मिक अर्थ

सायंकालीन प्रवचन में उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या करते हुए बताया गया कि सामान्य जीवन में सच बोलना व्यवहार सत्य माना जाता है, जबकि जैन दर्शन में निश्चय सत्य का संबंध आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने से है।

प्रवचन में कहा गया कि आत्मा को आत्मा और शरीर को शरीर जानना निश्चय सत्य है। शरीर जड़ और नाशवान है, जबकि आत्मा को ज्ञायक स्वरूप बताया गया। व्यक्ति जब शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है, तब वह अज्ञान की स्थिति में रहता है। अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में स्थिर होना उत्तम सत्य धर्म की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

प्रवचन में यह भी कहा गया कि जो व्यक्ति अपने स्वभाव में सत्य को पहचान लेता है, उसकी वाणी और आचरण में सत्य का प्रभाव दिखाई देता है।

बच्चों ने प्रस्तुत किया धार्मिक नाटक

सायंकालीन भक्ति और प्रवचन के बाद पाठशाला के बच्चों द्वारा धार्मिक नाटक की प्रस्तुति दी गई। नाटक के माध्यम से समय के प्रभाव और मृत्यु की अनिश्चितता को दर्शाते हुए जीवन में धर्म के महत्व का संदेश दिया गया। बच्चों की प्रस्तुति ने उपस्थित श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया।

डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि दसलक्षण पर्व के दौरान धार्मिक गतिविधियों का क्रम जारी है। इसी क्रम में रात्रि में युवा फेडरेशन द्वारा भक्ति संध्या और भक्तामर पाठ का विशेष आयोजन किया जाएगा।

दसलक्षण धर्म पर्व के पांचवें दिन आयोजित कार्यक्रमों में श्रद्धालुओं ने प्रवचन, स्वाध्याय, भक्ति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सहभागिता की। पूरे आयोजन में आत्मचिंतन, सत्य धर्म और भेद-विज्ञान के माध्यम से जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से समझने का संदेश दिया गया।


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