रतलाम। मंगलवार का दिन रतलाम कलेक्ट्रेट के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। आम जनता की फरियाद सुनने के लिए सजी 'जनसुनवाई' अचानक चीख-पुकार और अफरा-तफरी के अखाड़े में तब्दील हो गई। यहाँ एक मजबूर किसान ने सिस्टम की बेरुखी से तंग आकर मौत को गले लगाने की कोशिश की।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, नगरा निवासी 65 वर्षीय किसान प्यार सिंह पिता जुवान सिंह, पिछले तीन साल से सरकारी दफ्तरों की धूल फांक रहे हैं। मंगलवार को जब उनकी धैर्य की सीमा टूट गई, तो उन्होंने अपनी जेब से पेट्रोल की बोतल निकाली और सबके सामने खुद पर उड़ेल लिया।
इससे पहले कि प्यार सिंह माचिस जला पाते, वहां तैनात होमगार्ड के जांबाज जवानों ने बिजली की फुर्ती दिखाई। जवानों ने किसान को दबोच लिया और उनके हाथ से पेट्रोल की बोतल छीन ली। अगर पल भर की भी देरी होती, तो कलेक्ट्रेट परिसर एक खौफनाक मंजर का गवाह बन सकता था।
फसल की बर्बादी और तीन साल का ‘वनवास’
किसान प्यार सिंह का दर्द उनकी आँखों से साफ झलक रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि:
वर्ष 2023 में उन्होंने ग्रामोफोन कंपनी की रासायनिक दवा का इस्तेमाल अपनी लहसुन और प्याज की फसल पर किया था।
दवा के छिड़काव के बाद उनकी पूरी फसल बर्बाद हो गई, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
पिछले तीन वर्षों से वह मुआवजे और जांच रिपोर्ट के लिए अधिकारियों की चौखट पर माथा टेक रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमाया गया।
"जब फसल भी गई और साख भी, तो जीकर क्या करूँ? साहब लोग सिर्फ तारीख देते हैं, इंसाफ नहीं।" - पीड़ित किसान (सजल नेत्रों से)
प्रशासन का क्या है कहना?
घटना के बाद कलेक्ट्रेट में अफरा-तफरी मच गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए एडीएम डॉ. शालिनी श्रीवास्तव ने किसान से चर्चा की।
प्रशासनिक पक्ष रखते हुए एडीएम ने बताया कि, “किसान की शिकायत पर पहले भी जांच की जा चुकी है। चूंकि मामला एक निजी कंपनी और किसान के बीच का है, इसलिए किसान ने संबंधित कंपनी के खिलाफ उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) में केस दर्ज कराया है। प्रशासन नियमों के तहत हर संभव मदद का प्रयास कर रहा है।”
सिस्टम पर उठते सवाल
यह घटना केवल एक किसान के आत्मघाती कदम की कहानी नहीं है, बल्कि उस जटिल प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान है जहाँ एक अन्नदाता को अपनी मेहनत के मुआवजे के लिए 1000 से ज्यादा दिन इंतजार करना पड़ता है। क्या उपभोक्ता फोरम और प्रशासनिक जांच की सुस्त रफ्तार एक किसान की जान से ज्यादा कीमती है?
फिलहाल, पुलिस और प्रशासन किसान को समझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस घटना ने रतलाम प्रशासन की कार्यप्रणाली और जनसुनवाई की सार्थकता पर चर्चा छेड़ दी है।
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