न्यूज डेस्क, विदिशा भारती। इंदौर के देवगुराड़िया और कंपेल इलाके से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने बच्चों की सुरक्षा के तमाम दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। यहां स्कूली बच्चे अपनी पढ़ाई के लिए रोज़ मौत का सफर तय करने पर मजबूर हैं। पिछले करीब एक साल से इस व्यस्त रूट पर चलने वाली 'अटल सिटी बस' सेवा पूरी तरह ठप पड़ी है। नतीजतन, 60 से ज्यादा मासूम बच्चे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर निजी बसों की छतों पर बैठकर स्कूल जाने को विवश हैं।
मूसलाधार बारिश हो या कड़कड़ाती धूप, बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ बदस्तूर जारी था। लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो इन मासूमों ने खुद अपनी लड़ाई लड़ने की ठानी और सीधे इंदौर के जिला कलेक्टर शिवम वर्मा के दरबार में पहुंच गए।
ओवरलोड बसें और बारिश का डर: पैर रखने की जगह नहीं, छत ही सहारा
कंपेल और आसपास के ग्रामीण इलाकों से हर दिन सैकड़ों बच्चे शहर के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई करने आते हैं। जब तक अटल सिटी बस चल रही थी, तब तक सफर काफी हद तक सुरक्षित और सुगम था। लेकिन एक साल पहले अचानक सिटी बस का संचालन बंद कर दिया गया।
इसके बाद शुरू हुआ अव्यवस्था और खतरे का भयानक दौर! इस रूट पर चलने वाली निजी मिनी बसें क्षमता से तीन गुनी भरी होती हैं।
अंदर खचाखच भीड़: बस के भीतर तिल रखने की जगह नहीं बचती। पायदान (फुटबोर्ड) पर यात्री लटके रहते हैं।
छत बनी मजबूरी: अंदर जगह न मिलने के कारण मजबूरी में स्कूली छात्रों को बस की छत पर बैठना पड़ता है।
बारिश में बढ़ा खतरा: तेज बारिश और फिसलन भरे मौसम में जब बसें तेज रफ्तार से गड्ढों भरे रास्तों से गुजरती हैं, तो छत पर बैठे मासूमों के हाथ-पांव कांपने लगते हैं। ज़रा सा संतुलन बिगड़ा नहीं कि बड़ा हादसा तय है।
ग्रामीणों और अभिभावकों ने कई बार स्थानीय स्तर पर शिकायतें कीं, लेकिन निजी बस चालकों की मनमानी और ट्रांसपोर्ट विभाग की अनदेखी के चलते कोई हल नहीं निकला।
जब जनसुनवाई में पहुंचे मासूम: कलेक्टर के सामने बयां किया दर्द
निजी बस ऑपरेटरों की मनमानी और प्रशासनिक सुस्ती से तंग आकर बच्चों ने खुद हिम्मत जुटाई। वे गाड़ियां बदलकर और पैदल चलकर इंदौर कलेक्ट्रेट स्थित जनसुनवाई में जा पहुंचे।
कलेक्टर शिवम वर्मा के सामने जब इन स्कूली छात्रों ने अपनी आपबीती सुनाई, तो कलेक्ट्रेट परिसर में सन्नाटा पसर गया। बच्चों ने बताया कि कैसे उन्हें हर रोज स्कूल पहुंचने के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। सुबह घर से निकलते वक्त माता-पिता के चेहरे पर जो खौफ होता है, उसे वे हर दिन देखते हैं। अगर वे बस की छत पर न चढ़ें, तो उनकी पढ़ाई छूट जाएगी और अगर चढ़ते हैं, तो जिंदगी छूटने का डर रहता है।
"हम पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन बस की छत पर बैठकर सफर करना हमारी मजबूरी बन चुका है। अंदर पैर रखने तक की जगह नहीं होती, ऐसे में अगर हम छत पर न बैठें तो स्कूल ही नहीं पहुंच पाएंगे।"
— पीड़ित छात्र, देवगुराड़िया-कंपेल रूट
कलेक्टर शिवम वर्मा का सख्त रुख: 3 दिन का अल्टीमेटम!
मासूम बच्चों की जुबानी यह दर्दनाक दास्तान सुनकर कलेक्टर शिवम वर्मा बेहद गंभीर हो गए। उन्होंने तुरंत मामले को संज्ञान में लिया और मौके पर मौजूद परिवहन विभाग तथा एआईसीटीएसएल (AICTSL) के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई।
कलेक्टर ने बच्चों की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए संबंधित अधिकारियों को आगामी तीन दिनों के भीतर देवगुराड़िया-कंपेल रूट पर अटल सिटी बस सेवा को दोबारा बहाल करने के सख्त आदेश जारी किए हैं।
कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि:
अगले तीन दिनों के भीतर रूट पर पर्याप्त संख्या में सिटी बसों का संचालन शुरू किया जाए।
जब तक सिटी बसें पूरी तरह चालू नहीं होतीं, तब तक इस रूट पर अतिरिक्त बसों की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।
बसों की छत पर यात्रियों या छात्रों को बैठाने वाले निजी बस चालकों पर तत्काल एफआईआर (FIR) और भारी जुर्माना लगाया जाए।
प्रशासनिक सतर्कता की दरकार: क्या 3 दिन में बदलेगी तस्वीर?
कलेक्टर के इस कड़े रुख के बाद अब इंदौर के परिवहन महकमे में हड़कंप मच गया है। हालांकि, बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर एक साल तक जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदकर क्यों बैठे रहे? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा था?
स्कूली बच्चों की यह हिम्मत रंग लाई है, लेकिन अब देखना यह होगा कि 3 दिन के इस अल्टीमेटम के बाद कंपेल और देवगुराड़िया के बच्चों को सुरक्षित सफर का अपना हक मिल पाता है या नहीं। विदिशा भारती इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।
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