इंदौर। इंदौर के एबी रोड पर एलआईजी चौराहे से नौलखा चौराहे तक प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने परियोजना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। करीब 6.5 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर को लेकर अदालत ने तकनीकी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) के मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में हाईलेवल कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, अधिकारियों को परियोजना की कुल लागत और निर्माण पूरा होने की संभावित समय-सीमा सार्वजनिक करनी होगी।
न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की युगलपीठ ने 26 अक्टूबर 2026 को अतुल शेठ विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत के निर्णय से परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला है, जबकि निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी पहलुओं की नियमित समीक्षा भी होगी।
अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने की मांग पर क्या थी आपत्ति?
चार्टर्ड इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता अतुल शेठ ने जनहित याचिका दायर कर एलआईजी से नौलखा तक लगातार एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने की उपयोगिता पर सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि एबी रोड पर ज्यादातर वाहन लंबी दूरी तक सीधे जाने के बजाय एक या दो चौराहों के बाद दाएं या बाएं मुड़ते हैं। ऐसे में पूरे मार्ग पर एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने के बजाय प्रमुख चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर या ग्रेड सेपरेटर बनाना अधिक उपयोगी हो सकता है।
उन्होंने एमआर-9, एलआईजी, इंडस्ट्री हाउस, गिटार चौराहा, पलासिया, गीताभवन, शिवाजी वाटिका, जीपीओ और नौलखा चौराहे पर अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने का सुझाव दिया था। याचिकाकर्ता ने तकनीकी समीक्षा के लिए हाईकोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने और रिपोर्ट आने तक निर्माण रोकने की मांग भी की थी।
सर्वे रिपोर्ट और लागत पर उठाए गए सवाल
याचिका में परियोजना से संबंधित यातायात सर्वे और तकनीकी अध्ययनों का हवाला दिया गया था। याचिकाकर्ता के अनुसार, एक अध्ययन में अलग-अलग चौराहों पर फ्लाईओवर बनाने से यातायात दक्षता में 42 प्रतिशत से अधिक सुधार की संभावना जताई गई थी, जबकि प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर की उपयोगिता 10 प्रतिशत से कम बताई गई थी।
ये आंकड़े याचिकाकर्ता की दलीलों का हिस्सा थे। हाईकोर्ट ने इन्हें अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य घोषित नहीं किया।
परियोजना की लागत को लेकर भी सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि शुरुआती वर्षों में करीब 350 करोड़ रुपये बताई गई लागत बढ़कर 700 से 750 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है। हालांकि, अदालत ने लागत का कोई अंतिम आंकड़ा तय नहीं किया। उसने संबंधित अधिकारियों को वास्तविक कुल लागत और निर्माण की संभावित समय-सीमा सार्वजनिक करने के निर्देश दिए।
सरकार ने क्यों बताया जरूरी?
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी ने परियोजना का समर्थन करते हुए कहा कि इंदौर में वाहनों की संख्या और आबादी बढ़ने से एबी रोड पर यातायात का दबाव लगातार बढ़ रहा है। जमीन पर सड़क चौड़ी करने की संभावनाएं सीमित हैं। ऐसे में एलिवेटेड कॉरिडोर से मौजूदा छह लेन के अतिरिक्त चार लेन उपलब्ध कराने की योजना है।
सरकार के अनुसार, परियोजना भविष्य की यातायात जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने से वाहनों को बार-बार ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना पड़ेगा। फ्लाईओवर से उतरने के बाद सामान्य सड़क पर वाहनों के मिलने से जाम की समस्या भी बनी रह सकती है।
इंदौर उत्थान अभियान समिति ने भी परियोजना का समर्थन किया। समिति ने अतिरिक्त सड़क क्षमता और यातायात की निरंतरता को महत्वपूर्ण बताया।
हाईकोर्ट ने पुराने सर्वे पर क्या कहा?
अदालत ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करते हुए कहा कि इंदौर में बढ़ते यातायात के बीच सड़क व्यवस्था की अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
पीठ ने गौर किया कि एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट फरवरी से मार्च 2024 के दौरान तैयार हुई थी, जब शहर में बीआरटीएस संचालित था। बीआरटीएस हटने के बाद सड़क पर अतिरिक्त जगह उपलब्ध हुई, लेकिन बढ़ती आबादी और वाहनों के कारण उस जगह पर भी दबाव बढ़ रहा है। इसलिए पुराने सर्वे के निष्कर्षों को वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
अदालत के अनुसार, अलग-अलग चौराहों पर फ्लाईओवर बनाने से कुछ स्थानों पर राहत मिल सकती है, लेकिन उनसे सड़क की कुल अतिरिक्त क्षमता बढ़ाने का उद्देश्य पूरी तरह पूरा नहीं होगा। हालांकि, पीठ ने तकनीकी चिंताओं पर आगे विचार करने की गुंजाइश भी रखी।
PWD के मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में बनेगी समिति
हाईकोर्ट के निर्देशानुसार गठित समिति में लोक निर्माण विभाग के दो सदस्य, इंदौर विकास प्राधिकरण के दो सदस्य, एसजीएसआईटीएस के दो सदस्य, याचिकाकर्ता अतुल शेठ और इंदौर उत्थान अभियान समिति के दो सदस्य शामिल होंगे।
समिति के सदस्यों के लिए सिविल या स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में बीई अथवा बीटेक की न्यूनतम योग्यता निर्धारित की गई है। एसजीएसआईटीएस के नामित अनुभवी प्राध्यापकों को छोड़कर अन्य सदस्यों के पास पुल निर्माण से जुड़ा अनुभव भी होना चाहिए।
समिति कम से कम महीने में एक बार निर्माण कार्य की समीक्षा करेगी। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बैठकें भी होंगी। समिति तकनीकी समस्याओं पर पीडब्ल्यूडी को सलाह देगी और निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाएंगे।
इंदौर के यातायात के लिए क्यों अहम है फैसला?
हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज करते हुए एलिवेटेड कॉरिडोर पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि परियोजना राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय है। पर्याप्त आधार के बिना ऐसे निर्णय में न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
इस फैसले के बाद एलआईजी से नौलखा तक प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया है। अब परियोजना की तकनीकी निगरानी, नियमित समीक्षा और लागत तथा निर्माण अवधि की सार्वजनिक जानकारी पर नजर रहेगी।
प्रकरण विवरण: अतुल शेठ विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य, डब्ल्यूपी क्रमांक 3905/2026। फैसला 26 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। उद्धरण: 2026:MPHC-IND:30023।
इंदौर के लिए इस फैसले का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि एबी रोड पर यातायात का दबाव शहर की आवाजाही को प्रभावित करता है। अब परियोजना के क्रियान्वयन के साथ तकनीकी निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करना संबंधित विभागों की अहम जिम्मेदारी होगी।
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