सांची: भारतीय संस्कृति और बौद्ध दर्शन की खुशबू एक बार फिर सात समंदर पार बिखरने को तैयार है। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सांची के स्तूप परिसर में सुरक्षित रखे भगवान बुद्ध के दो सबसे प्रिय शिष्यों, अर्हन्त सारिपुत्र और अर्हंत महामोगल्यान के पवित्र अवशेष (अस्थियां) अब मंगोलिया के श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे।
भारत सरकार और मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के समन्वय से यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। इस यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को और प्रगाढ़ करना और 'वसुधैव कुटुंबकम' के संदेश को वैश्विक पटल पर फैलाना है।
राजकीय सम्मान के साथ विदाई: गार्ड ऑफ ऑनर ने बढ़ाया गौरव
सांची के चैतियगिरी विहार मंदिर में यह पल बेहद भावुक और गौरवशाली था। पवित्र अवशेषों को जब मंदिर के सुरक्षित तहखाने से बाहर लाया गया, तो पूरा परिसर बुद्धम शरणम गच्छामि के उद्घोष से गूंज उठा।
विधि-विधान: सबसे पहले मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई।
सशस्त्र सलामी: जब पवित्र अस्थियों को मंदिर से बाहर लाया गया, तो उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर (राजकीय सलामी) दी गई।
हस्तांतरण: पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल, महाबोधी सोसायटी श्रीलंका के प्रमुख वानगल उपतिस्स नायक थेरो और कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा की मौजूदगी में इन अवशेषों को राष्ट्रीय संग्रहालय के निदेशक यश सक्सेना को सौंपा गया।
पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और पंचनामा तैयार किया गया ताकि सुरक्षा और मर्यादा में कोई चूक न हो।
मंगोलिया के 'गंडन तेगचेनलिंग मठ' में सजेगा दरबार
इन पवित्र अवशेषों का सफर दिल्ली के रास्ते मंगोलिया तक तय होगा। भोपाल से विशेष सुरक्षा के बीच हवाई जहाज से इन्हें दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय ले जाया गया है।
खास जानकारी: 29 मई को ये अवशेष मंगोलिया की राजधानी उलानबटोर पहुंचेंगे। वहां के प्रसिद्ध गंडन तेगचेनलिंग मठ में इन्हें श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखा जाएगा। मंगोलिया में बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा है, और भारत से इन अवशेषों का वहां जाना एक बड़े उत्सव के समान है।
वापसी का शेड्यूल: कब लौटेंगे 'सारिपुत्र और महामोगल्यान'?
श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा सीमित समय की है। तय कार्यक्रम के अनुसार:
10 जून: पवित्र अवशेष मंगोलिया से वापस दिल्ली आएंगे।
11 जून: दिल्ली से सुरक्षित तरीके से इन्हें वापस सांची लाया जाएगा।
पुनः स्थापना: सांची के चैतियगिरी विहार में इन्हें फिर से उसी गरिमा और सुरक्षा के साथ स्थापित कर दिया जाएगा।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नई मिसाल
इस आयोजन में पुलिस अधीक्षक आशुतोष गुप्ता और जिला पंचायत सीईओ कमल सोलंकी सहित प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मुस्तैद रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की 'सॉफ्ट पावर' को दुनिया के सामने रखने का यह सबसे सशक्त माध्यम है। भगवान बुद्ध के शिष्यों की यह अस्थियां केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि शांति, अहिंसा और करुणा के उस मार्ग की गवाह हैं, जिस पर चलकर भारत 'विश्व गुरु' कहलाया
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