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पठारी हाट में स्वदेशी का डंका: कुरवाई एसडीएम और पठारी तहसीलदार ने खरीदे मिट्टी के दीये

04-11-2026  Editor Shubham Jain  112 views
पठारी हाट में स्वदेशी का डंका: कुरवाई एसडीएम और पठारी तहसीलदार ने खरीदे मिट्टी के दीये

विदिशा भारती डेस्क

पठारी । दीपावली की जगमगाहट से पहले विदिशा जिले के पठारी कस्बे का साप्ताहिक हाट बाजार उस समय पूरी तरह से स्वदेशी रंग में रंग गया, जब प्रशासनिक अमला खुद खरीदारी करने जमीन पर उतरा। कुरवाई एसडीएम मोतीलाल अहिरवार और पठारी तहसीलदार प्रेमलता पाल ने पठारी के पारंपरिक हाट बाजार में पहुंचकर न केवल व्यवस्थाओं का जायजा लिया, बल्कि आम खरीदार बनकर स्थानीय कामगारों से खरीदारी की। अधिकारियों ने माटी के दीये, किसानों की मौसमी फसलें और गोवंश के पारंपरिक श्रृंगार की सामग्री खरीदी। इस पहल ने बाजार में मौजूद हर शख्स को अपनी माटी, अपने हुनर और वोकल फॉर लोकल के संकल्प से जोड़ दिया।

साधारण खरीदार बनकर पहुंचे अधिकारी, खिल उठे कुम्हारों के चेहरे
त्योहारी सीजन में पठारी का हाट बाजार स्थानीय ग्रामीणों और व्यापारियों से खचाखच भरा हुआ था। आमतौर पर अफसरों का बाजार दौरा केवल निरीक्षण या कानून व्यवस्था तक सीमित रहता है, लेकिन यहां नजारा बिल्कुल अलग था। एसडीएम अहिरवार और तहसीलदार पाल सीधे उन फुटपाथों और पटरियों पर पहुंचे, जहां गांव-देहात से आए कुम्हार अपने चाक पर गढ़े मिट्टी के दीपक सजाए बैठे थे।

अधिकारियों ने कुम्हारों से मोलभाव किए बिना मिट्टी के दीये खरीदे और उनका हालचाल जाना। प्रशासन के शीर्ष अफसरों को अपनी टोकरी के सामने बैठा देखकर कारीगरों के चेहरे चमक उठे। अधिकारियों ने संदेश दिया कि माटी के ये नन्हे चिराग सिर्फ घर नहीं रोशन करते, बल्कि उन मेहनतकश परिवारों के चूल्हे भी जलाते हैं जो महीनों पहले से दीपावली की तैयारी में जुट जाते हैं।

रतालू, सिंघाड़े और महुरी की महक: किसानों को मिला सीधा संबल
बाजार में स्थानीय किसानों द्वारा लाई गई मौसमी उपजों के ढेरों पर भी अधिकारियों का काफिला रुका। एसडीएम और तहसीलदार ने किसानों से सीधे संवाद किया और उनकी ताजा उपज जैसे रतालू, सिंघाड़े और पूजा-अर्चना में काम आने वाली महुरी की खरीदारी की।

अधिकारियों ने कहा कि बिचौलियों के बिना सीधे खेत से हाट तक अपनी उपज लाने वाले ये किसान हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ हैं। जब हम अपने आसपास के खेतों में उपजी सामग्री खरीदते हैं, तो धन सीधे गांव के घर तक पहुंचता है। अधिकारियों की इस खरीदारी को देखकर बाजार में आए अन्य नागरिकों ने भी प्लास्टिक और पैकेटबंद सामानों को छोड़कर किसानों की देसी उपज खरीदने में गहरी रुचि दिखाई।

गोवर्धन पूजा और पड़वा की तैयारी: गोमाता के श्रृंगार का सामान भी खरीदा

बुंदेलखंड और मालवा के अंचल में दीपावली के साथ-साथ गोवर्धन पूजा और गो-क्रीड़ा का विशेष धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व है। हाट बाजार में गाय-बैलों को सजाने वाली रंग-बिरंगी घंटियां, कौड़ियों की झालर, मोरपंख और गले के पट्टे सजे हुए थे।

तहसीलदार पाल और एसडीएम अहिरवार ने इन पारंपरिक दुकानों का रुख किया और गोमाता के गले में बांधने वाली हस्तनिर्मित सजावटी सामग्री खरीदी। अधिकारियों ने उपस्थित लोगों से कहा कि हमारी संस्कृति पशुधन और प्रकृति के सम्मान पर टिकी है। त्योहारों की सार्थकता तभी है जब हम अपनी प्राचीन परंपराओं, गोवंश और उनसे जुड़े हस्तशिल्प को संजोकर रखें।

प्लास्टिक और विदेशी सामान को कहें ना, स्वदेशी को बनाएं आदत

खरीदारी के दौरान अधिकारियों ने दुकानदारों, व्यापारियों और ग्रामीण नागरिकों से खुलकर चर्चा की। एसडीएम अहिरवार ने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में हम अक्सर सस्ती और कृत्रिम चमक-दमक के पीछे भागते हैं, जिससे हमारे अपने कारीगर बेरोजगार हो रहे हैं। दीपावली का असली उल्लास तभी है जब हर घर में खुशहाली आए। उन्होंने नागरिकों से आह्वान किया कि वे विदेशी झालरों और प्लास्टिक के कृत्रिम उत्पादों का त्याग करें और शुद्ध माटी के दीये प्रज्वलित करें।

तहसीलदार पाल ने महिलाओं और युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि एक छोटा सा बदलाव किसी गरीब परिवार की जिंदगी बदल सकता है। जब हम स्थानीय बाजार से खरीदारी करते हैं, तो वह केवल व्यापार नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन होता है। उन्होंने सभी से अपील की कि इस बार की दीपावली पूरी तरह स्वदेशी और पर्यावरण के अनुकूल मनाएं।

प्रशासन की पहल से व्यापारियों और ग्रामीणों में नया उत्साह

अधिकारियों की इस सहज और जमीनी कार्यशैली की पूरे पठारी क्षेत्र में जमकर सराहना हो रही है। अधिकारियों के साथ राजस्व निरीक्षक (आरआई) रोडमल भिलाला, रोजगार सहायक मुकेश जैन और अन्य स्थानीय कर्मचारी मौजूद रहे। प्रशासनिक अफसरों को अपने बीच पाकर और उन्हें स्वदेशी सामग्री खरीदते देखकर हाट में आए हजारों लोगों में स्थानीय उत्पादों के प्रति भारी उत्साह देखा गया। पठारी का यह साप्ताहिक हाट केवल व्यापार का केंद्र नहीं रहा, बल्कि सामाजिक समरसता और आत्मनिर्भर भारत के जीवंत मंच में तब्दील हो गया।


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