राजेश शर्मा भोपाल/सतना (मध्य प्रदेश): कहते हैं कि सरकारी फाइलों में भ्रष्टाचार की दीमक बहुत गहरी होती है, लेकिन जब कोई अंदर का ही खिलाड़ी 'सिस्टम' के काले चिट्ठे खोल दे, तो भूचाल आना तय है। सतना जिले के एक निलंबित सब इंजीनियर (उप यंत्री) ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर पंचायत और निर्माण कार्यों में चल रही कथित 'कमीशनखोरी' की कलई खोल दी है। इस खुलासे के बाद पूरे प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
आखिर वीडियो में क्या है?
निलंबित उप यंत्री ने अपने इस सनसनीखेज वीडियो में दावा किया है कि ग्राम पंचायतों में होने वाले हर छोटे-बड़े निर्माण कार्य में कमीशन का 'रेट कार्ड' फिक्स होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर जो पैसा आवंटित होता है, उसका एक बड़ा हिस्सा ऊपर से नीचे तक की जेबों में बंट जाता है।
वीडियो में सब इंजीनियर ने स्पष्ट रूप से उन पदों का जिक्र किया है, जो कथित तौर पर इस 'कमीशन तंत्र' का हिस्सा हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्माण कार्यों और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान सरपंच, सचिव, जीआरएस (GRS), सहायक यंत्री और उप यंत्री स्तर तक कमीशन की व्यवस्था प्रचलित है। इतना ही नहीं, उन्होंने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि यह भ्रष्टाचार केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार भोपाल स्तर तक जुड़े हुए हैं।
गुणवत्ता पर लगा ‘भ्रष्टाचार का ग्रहण’
सब इंजीनियर का तर्क है कि जब निर्माण कार्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा कमीशन में ही चला जाएगा, तो काम की गुणवत्ता कैसी होगी? यह एक बड़ा सवाल है। उन्होंने दावा किया कि इस कमीशनखोरी का सीधा असर विकास कार्यों की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर पड़ता है। जो सरकारी खजाना ग्रामीण विकास के लिए है, वह कथित तौर पर चंद हाथों में सिमट रहा है। पारदर्शिता का दम भरने वाले विभाग की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
क्या प्रदेश भर में गूँजेंगे ये आरोप?
उप यंत्री के इन आरोपों के सामने आने के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ सतना ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की पंचायतों में इन आरोपों की जांच होगी? यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह मामला ग्रामीण विकास योजनाओं और सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़ा एक बेहद गंभीर और बड़ा विषय साबित हो सकता है।
जांच की मांग और विभाग की चुप्पी
वीडियो वायरल होते ही पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग की कार्यप्रणाली कटघरे में आ गई है। हालाँकि, वीडियो में लगाए गए इन आरोपों की अभी तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। साथ ही, संबंधित विभाग या वीडियो में नाम लिए गए अधिकारियों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इस गंभीर मामले ने शासन-प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। अब देखना यह होगा कि शासन और प्रशासन इस वीडियो में लगाए गए आरोपों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाती है या नहीं? इस मामले की निष्पक्ष जांच होने पर ही आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।
फिलहाल, आम जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इस कमीशन तंत्र पर लगाम लगाएगी या फिर मामला हमेशा की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
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