भोपाल: राजधानी भोपाल में विकास के नाम पर 'अजब-गजब' कारनामे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन इस बार ऐशबाग इलाके से सामने आई खबर ने सबको हैरान कर दिया है। यहां पैदल चलने वालों की सुविधा के लिए बनाया गया फुटपाथ अब एक 'पहेली' और 'पिंजरा' बन चुका है। ऐशबाग के 90 डिग्री ब्रिज के पास बनी फुटपाथ की व्यवस्था ने नगर निगम की प्लानिंग पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
फुटपाथ या 'मौत का जाल'?
ऐशबाग के 90 डिग्री ब्रिज के पास का नज़ारा कुछ ऐसा है कि राहगीर भी अपना सिर पकड़ने को मजबूर हैं। पैदल यात्रियों को सहूलियत देने के लिए बनाए गए फुटपाथ को लोहे की रेलिंग लगाकर लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। स्थिति इतनी खराब है कि फुटपाथ पर आने-जाने के लिए जो चंद 'कट पॉइंट्स' छोड़े गए थे, उन पर भी स्थानीय ठेले वालों का कब्जा हो चुका है। अब राहगीरों के पास चलने के लिए जगह ही नहीं बची है।
पिंजरे में तब्दील हुआ रास्ता
हद तो तब हो गई जब फुटपाथ के एक तरफ लोहे की मजबूत जाली लगा दी गई और दूसरी तरफ पक्की दीवार खड़ी कर दी गई। यह रास्ता अब किसी फुटपाथ जैसा नहीं, बल्कि एक तंग 'पिंजरे' जैसा प्रतीत हो रहा है। बस यात्रियों और राहगीरों के लिए इस फुटपाथ तक पहुंचना किसी संघर्ष से कम नहीं है। स्थानीय लोगों का स्पष्ट कहना है कि यह 'विकास' नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जनता के गाढ़े पसीने की कमाई और सरकारी बजट की निर्मम बर्बादी है।
पार्षद निधि का 'अजीब' कारनामा
सूत्रों के अनुसार, यह निर्माण कार्य पार्षद निधि से करवाया जा रहा है। सवाल यह है कि जिस फंड का उपयोग जनसुविधा के लिए होना था, उससे ऐसी व्यवस्था क्यों बनाई गई जो व्यावहारिक ही नहीं है? स्थानीय लोगों के आक्रोश के बाद अब स्थानीय पार्षद आरती अनेजा ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि वर्तमान व्यवस्था पूरी तरह से अव्यावहारिक है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस गलत डिजाइन को जल्द ही बदलवाया जाएगा।
अधिकारियों ने शुरू की जांच
मामले ने तूल पकड़ा तो नगर निगम के अधिकारी भी हरकत में आए। ईई एन.के. डेहरिया ने मामले में संज्ञान लेते हुए कहा है कि यदि निर्माण में व्यवहारिक दिक्कतें हैं, तो उसे दुरुस्त किया जाएगा। फिलहाल अधिकारियों ने मौके का मुआयना कर जांच शुरू कर दी है।
क्या यही है 'स्मार्ट सिटी' की परिभाषा?
भोपाल के नागरिकों का कहना है कि शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर ऐसी प्लानिंग समझ से परे है। फुटपाथ पर चलना अब आसान नहीं रह गया है—पहले रास्ता ढूंढना पड़ता है, फिर सफर शुरू होता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कब तक इस 'पिंजरे' को हटाकर आम जनता के लिए रास्ता सुगम बनाया जाता है।
'विदिशा भारती' की टीम इस खबर पर लगातार नजर बनाए हुए है। हम प्रशासन से उम्मीद करते हैं कि जल्द ही इस भूल को सुधारकर नागरिकों को राहत दी जाएगी।
Leave a comment
Your email address will not be published. Required fields are marked *