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सांची में ब्रिक्स मंत्रियों का दौरा, दो हजार साल पुरानी बौद्ध विरासत से रूबरू हुए विदेशी मेहमान

08-08-2026  Vijay Sharma  43 views
सांची में ब्रिक्स मंत्रियों का दौरा, दो हजार साल पुरानी बौद्ध विरासत से रूबरू हुए विदेशी मेहमान

वसीम कुरेशी रायसेन।

ब्रिक्स देशों के संस्कृति मंत्रियों का सांची दौरा सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस दौरे ने भारत की प्राचीन बौद्ध विरासत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दी है। चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और कतर के उच्च-स्तरीय प्रतिनिधियों ने मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक स्थल सांची का भ्रमण किया। सभी मेहमानों ने दो हजार वर्ष पुरानी बौद्ध परंपराओं का गहराई से अवलोकन किया। इस महत्वपूर्ण आयोजन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को और अधिक सुदृढ़ किया है।

सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय ने इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन की पूरी व्यवस्था को सफलतापूर्वक संचालित किया। विश्वविद्यालय के बौद्ध दर्शन विभाग के प्रमुख संतोष प्रियदर्शी ने विदेशी मेहमानों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अतिथियों को सांची की ऐतिहासिक वास्तुकला, प्राचीन दर्शन और समृद्ध संस्कृति से अवगत कराया। उनके विशेषज्ञ मार्गदर्शन ने प्रतिनिधियों को सांची के गौरवशाली अतीत को बहुत पास से महसूस करने का अवसर दिया।

विदेशी प्रतिनिधियों ने मुख्य सांची स्तूप के दर्शन किए। उन्होंने स्तूप परिसर के शांत और आध्यात्मिक वातावरण की भूरी-भूरी प्रशंसा की। स्तूप के चारों ओर बने नक्काशीदार तोरण द्वार प्रतिनिधियों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र रहे। इन द्वारों पर उकेरी गई बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाओं ने सभी का मन मोह लिया। प्रतिनिधियों ने इन कलाकृतियों के निर्माण की तकनीकों पर भी चर्चा की।

स्तूप परिसर के नीचे स्थित जंबूद्वीप पार्क इस दौरे का एक और प्रमुख हिस्सा रहा। इसके अलावा अशोक एमपी ट्रेल का भी प्रतिनिधियों ने बारीकी से निरीक्षण किया। इन दोनों स्थानों पर मध्य प्रदेश के विभिन्न स्तूपों का भौतिक प्रदर्शन किया गया है। सांची स्तूप के निर्माण के ऐतिहासिक चरणों को इन स्थानों पर अत्यंत आकर्षक रूप में दर्शाया गया है। संतोष प्रियदर्शी ने इन सभी प्रदर्शनों का खाका अपनी देखरेख में तैयार करवाया था।

सारिपुत्त और महामोग्गलान पर आधारित एक विशेष पवेलियन भी स्थापित किया गया था। इस पवेलियन में उनके जीवन से जुड़ी कथाओं को प्रदर्शित किया गया। विशेष वृत्तचित्रों के माध्यम से अतिथियों को बौद्ध इतिहास की गहराई समझाई गई। इन सभी प्रस्तुतियों ने विदेशी मेहमानों को भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों से जोड़ा।

सांची विश्वविद्यालय के पुस्तकालय ने एक विशेष पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया। इस प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य ज्ञान और साहित्य का आदान-प्रदान बढ़ाना था। बौद्ध धर्म, दर्शन और इतिहास से जुड़ी दुर्लभ पुस्तकें इस प्रदर्शनी में रखी गईं। अंतरराष्ट्रीय अतिथियों ने इन पुस्तकों का अध्ययन किया और भारतीय साहित्य की विद्वत्ता को सराहा। पुस्तकालय की इस पहल ने बौद्ध अध्ययन के महत्व को रेखांकित किया।

कार्यक्रम में कई प्रमुख प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तियों की गरिमामय उपस्थिति रही। केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस कार्यक्रम की अगुवाई की। मध्य प्रदेश के पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने भी अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई। मध्य प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव और सांची विश्वविद्यालय के कुलपति शिवशेखर शुक्ला कार्यक्रम में शामिल हुए। सांची विश्वविद्यालय के कुलसचिव रामनिवास गुप्ता ने भी अतिथियों के सत्कार में पूरा योगदान दिया। इन सभी ने मिलकर विदेशी मेहमानों का भव्य स्वागत किया।

सांची का इतिहास सम्राट अशोक के काल से जुड़ा हुआ है। मौर्य साम्राज्य के दौरान इस स्थान ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने यहां मुख्य सांची स्तूप का निर्माण करवाया था। बौद्ध भिक्षुओं ने इस शांत भूमि को अपनी साधना और ज्ञान का मुख्य केंद्र बनाया था। आज भी दुनिया भर के शोधकर्ता और पर्यटक इस पवित्र भूमि पर अध्ययन करने आते हैं।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान इन ऐतिहासिक तथ्यों पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रतिनिधियों ने प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और आवासीय विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली की प्रशंसा की। सांची विश्वविद्यालय प्राचीन ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। विश्वविद्यालय लगातार बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र में नए अनुसंधान कर रहा है। विदेशी मेहमानों ने विश्वविद्यालय के इन शैक्षणिक प्रयासों की खुलकर सराहना की।

सांची स्तूप की वास्तुकला दुनिया भर के इंजीनियरों और इतिहासकारों को हैरान करती है। बिना किसी आधुनिक तकनीक के बड़े पत्थरों को आपस में जोड़कर बनाए गए ये स्तूप भारतीय शिल्प कौशल का उत्कृष्ट प्रमाण हैं। तोरण द्वारों पर उकेरी गई आकृतियां विभिन्न जातक कथाओं का वर्णन करती हैं। विदेशी डेलीगेट्स ने इन तोरण द्वारों के पास खड़े होकर विस्तृत तस्वीरें लीं। उन्होंने भारतीय मूर्तिकला की बारीकियों और पाषाण कला को बहुत ध्यान से देखा।

मध्य प्रदेश सरकार राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। सांची जैसे ऐतिहासिक स्थल राज्य की सांस्कृतिक पहचान का मुख्य आधार स्तंभ हैं। वैश्विक स्तर पर ऐसे आयोजनों के माध्यम से पर्यटन उद्योग को तीव्र गति मिलती है। विदेशी मेहमानों का यह दौरा स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद फायदेमंद साबित हुआ है। हस्तशिल्प कारीगरों और स्थानीय व्यापारियों को इस आयोजन से रोजगार के नए अवसर मिले हैं।

सांची विश्वविद्यालय का परिसर इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के दौरान पूरी तरह से सुसज्जित था। सुरक्षा व्यवस्था और आतिथ्य सत्कार के अत्यंत पुख्ता इंतजाम किए गए थे। स्थानीय प्रशासन ने विदेशी मेहमानों की पूरी यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाया। किसी भी प्रकार की असुविधा से बचने के लिए विशेष प्रशिक्षित दल तैनात किए गए थे। सभी विदेशी मेहमानों ने भारतीय संस्कृति के पारंपरिक आतिथ्य की खुलकर प्रशंसा की।

सांची के इस ऐतिहासिक दौरे ने सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। ब्रिक्स देशों के बीच आपसी सहयोग का दायरा अब संस्कृति, कला और उच्च शिक्षा तक फैल चुका है। भविष्य में ऐसे और भी कई द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। भारत और अन्य देश मिलकर अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करेंगे। सांची की यह पावन धरती विश्व शांति, बंधुत्व और करुणा का संदेश पूरी दुनिया तक निरंतर पहुंचाती रहेगी।


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