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शादी के नाम पर गिरोह का कारोबार – नकली माता-पिता, फर्जी मौलवी और लुटेरी दुल्हन

2025-06-08  Amit raikwar  1,314 views

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By उदयराज शुक्ला उत्तर प्रदेश| प्रयागराज | Updated: [08/06/2025)

शादी को कहते हैं सात जन्मों का बंधन, लेकिन शहाना के लिए यह सिर्फ 7 मिनट की डील थी।

हिंदू हो या मुस्लिम, पंडित हो या मौलवी, शादी के मंडप से लेकर निकाह की मेहराब तक इस 'दुल्हनिया गिरोह' ने सबको बना दिया खिलौना। उत्तर प्रदेश की संगम नगरी प्रयागराज से जो कहानी सामने आई है, वह न सिर्फ समाज को आईना दिखाती है बल्कि हमारी भरोसे की बुनियाद को भी हिला देती है।

20 शादियां, 6 निकाह और एक ही स्क्रिप्ट: “माल समेटो और निकल लो”।

▶️ 'दुल्हन' नहीं, ‘धोखा एक्सप्रेस’

प्रयागराज पुलिस ने जिस महिला को गिरफ्तार किया है, उसका नाम शहाना है — लेकिन इसकी पहचान एक नाम तक सीमित नहीं। कभी निशा, कभी प्रीति, तो कभी ममता बनकर वह दुल्हन बनती गई और दूल्हे की किस्मत लूटती गई। यह कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि उस रियलिटी शो की कहानी है, जिसमें हर एपिसोड में नया दूल्हा होता था और एक ही अंत – लुटे हुए सपने, सूनी सेज और खाली लॉकर।

📌 दुल्हन संग चलता था पूरा बाराती गैंग

शहाना अकेली नहीं थी। उसके साथ थे निकाह कराने वाले मौलवी, फर्जी कन्यादान करने वाले माता-पिता, शादी कराने वाले पंडित और भावी दामादों को झांसा देने वाले दलाल। गिरोह के मास्टरमाइंड श्रीराम गुर्जर ने 'शादी करवाओ – जीवन बर्बाद करवाओ' योजना इतनी सफाई से चलाई कि पुलिस को भी यकीन न हुआ कि कोई ऐसा भी 'सेवा' दे सकता है।

📍 हरियाणा-राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक चला लूट का 'सात फेरे' टूर

गिरोह खासतौर पर ऐसे युवकों को तलाशता था जो लंबे समय से शादी के लिए तरस रहे थे। उम्र बढ़ रही थी, जिम्मेदारियां चढ़ रही थीं और समाज का दबाव सिर पर। ऐसे में जब 'संपर्क सूत्र' के ज़रिये कोई सुंदर, समझदार, घरेलू लड़की देखने को मिलती, तो बेचारा दूल्हा सोचे बिना हां कर देता। बस फिर क्या, तुरही बजती, शादी होती और विदाई से पहले ही दुल्हन लापता हो जाती।

🕵️‍♀️ कैसे हुआ खुलासा?

प्रयागराज के खुल्दाबाद इलाके में पुलिस को एक गुप्त सूचना मिली कि फर्जी शादी रैकेट की कुछ महिलाएं यहां डेरा डाले हुए हैं। दबिश दी गई और एक युवती को अरेस्ट किया गया, जो खुद को 'शहाना' बता रही थी। पूछताछ में उसने पूरे रैकेट का खुलासा कर दिया। इसके बाद पीपलगांव से निशा व प्रीति, झूंसी से ममता भारतीय, शाहगंज से आसिफ और मो. जैनुल तथा अलवर से श्रीराम गुर्जर को पुलिस ने धर दबोचा।

😲 'शादी के नाम पर व्यापार', जिसमें मंडप ही बन गया मंडी

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इस गिरोह का नेटवर्क तीन राज्यों में फैला था। शिकार की तलाश में ये लोग हरियाणा और राजस्थान जैसे इलाकों में जाते, जहां लड़कों की शादी नहीं हो रही होती। फिर लड़के के घर वालों को लड़की दिखाई जाती। अगर लड़का हिंदू हो तो पंडित की व्यवस्था, मुस्लिम हो तो मौलवी तैयार। पंडित और मौलवी भी गिरोह के ही सदस्य होते थे। इतना ही नहीं, लड़की के माता-पिता का रोल भी प्ले किया जाता था, और कुछ मामलों में 'कन्या दान' का सीधा लाइव टेलीकास्ट भी होता था।

📦 लूट की पूरी स्क्रिप्ट तैयार

शादी होती, दूल्हा खुश, घर वाले भावुक और तभी शुरू होती थी ‘ऑपरेशन विदाई’। लड़की विदाई के नाम पर गहने-जेवर समेटती और गाड़ी में बैठते ही बीच रास्ते बहाना बनाकर उतर जाती। अगर मौका न मिले तो वह ससुराल जाकर सुहागरात से पहले फरार हो जाती। दो-तीन मामलों में जब भागने का मौका नहीं मिला, तो फर्जी मां-बाप आकर ‘समाज में बेटी की विदाई जरूरी है’ का बहाना बनाकर उसे वापस ले जाते।

📊 पुलिस की चार्जशीट में क्या?

प्रयागराज पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, इस गिरोह ने बीते तीन वर्षों में करीब 20 से ज्यादा शादियां और 6 निकाह किए हैं। इन सभी मामलों में एक ही पैटर्न था:

लड़का खोजो

विश्वास जमाओ

शादी या निकाह रचाओ

गहने और कैश समेटो

गायब हो जाओ

यह पूरा रैकेट ना सिर्फ शातिर है, बल्कि आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल करता रहा है। सोशल मीडिया और मैट्रिमोनियल साइट्स इनके सबसे बड़े शिकारगाह थे।

⚖️ क्या कहती है पुलिस?

पुलिस का कहना है कि गिरोह के सदस्य बेहद प्रोफेशनल थे। शादी के लिए बाकायदा कार्ड छपवाए जाते थे, रिश्तेदारों के नाम से फर्जी कॉल्स आते थे और दुल्हन का अभिनय तो ऐसा कि असली बहुओं को भी जलन हो जाए। हालांकि अब इनके ठिकानों की जानकारी मिलने पर कई पुराने पीड़ित भी सामने आ रहे हैं।

सबक क्या है?

शादी कोई मज़ाक नहीं, लेकिन भरोसे के नाम पर हो रहे फर्जीवाड़े ने इसे मज़ाक बना डाला है। ऐसे मामलों से न केवल समाज में डर का माहौल बनता है, बल्कि विश्वास की डोर भी टूट जाती है।

अगर आप या आपके जानने वाले शादी के लिए किसी एजेंट या अपरिचित माध्यम से लड़की देख रहे हैं, तो सावधानी अनिवार्य है। पंडित-मौलवी और माता-पिता के रोल में भी अब जांच-पड़ताल जरूरी हो गई है।

 

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नोट: यह रिपोर्ट स्वतंत्र पत्रकारिता के उस हिस्से का हिस्सा है, जो समाज को सच्चाई दिखाने का कार्य करती है। यह लेख सार्वजनिक हित में लिखा गया है और इसमें प्रयुक्त नाम व विवरण पुलिस रिकॉर्ड पर आधारित हैं।


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