
रायसेन, मध्य प्रदेश: सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार की खबरें तो आती रहती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से जो मामला सामने आया है, उसने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि भ्रष्टाचार की परिभाषा को भी बदल दिया है। जनपद पंचायत बाड़ी के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत उड़दमऊ में सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक ने मिलकर मनरेगा (MNREGA) योजना को एक 'हॉरर शो' में बदल दिया है। यहां मृत व्यक्तियों के नाम पर बकायदा मजदूरी कराई जा रही है और सरकारी खजाने से लाखों रुपये लूटे जा रहे हैं।
मृत आत्माओं के नाम पर सक्रिय जॉब कार्ड
इस सनसनीखेज घोटाले के केंद्र में ग्राम पंचायत उड़दमऊ है। ग्रामीणों का आरोप है कि यहां सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक की तिकड़ी ने मिलकर मनरेगा पोर्टल पर उन लोगों के जॉब कार्ड सक्रिय दिखा दिए हैं, जो इस दुनिया में हैं ही नहीं। ग्राम गोरिया, इमलिया और आफतगंज जैसे गांवों में मृतक नवाब खान, शब्बीर खान, और रशीद खान जैसे नाम आज भी सरकारी रिकॉर्ड में 'मेहनती मजदूर' के रूप में काम करते नजर आ रहे हैं।
सवाल यह है कि ये 'मृत मजदूर' भला कहां और कैसे काम कर रहे हैं? क्या ग्राम पंचायत के अधिकारी अब तांत्रिक बन गए हैं, जो मृत आत्माओं को बुलाकर उनसे मनरेगा में मजदूरी करवा रहे हैं? हकीकत यह है कि इन 'भूतिया मजदूरों' के नाम पर आने वाली लाखों रुपये की सरकारी राशि सीधे भ्रष्टाचारियों की जेब में जा रही है।
मशीनों से काम, भुगतान मजदूरों को
भ्रष्टाचार का यह खेल यहीं नहीं थमता। ग्राम पंचायत उड़दमऊ में ग्रेवल रोड निर्माण, कपिल धारा कूप, खेत तालाब योजना और सीसी नाली निर्माण जैसे कार्यों को अंजाम देने के लिए जेसीबी और ट्रैक्टर ट्रालियों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया गया। जबकि मनरेगा की गाइडलाइंस के अनुसार, इन कार्यों में मजदूरों से काम कराना अनिवार्य है।
मशीनों से काम करवाने के बावजूद, भुगतान फर्जी तरीके से गरीब मजदूरों और यहां तक कि मृत लोगों के नाम पर किया गया। कई हितग्राहियों ने यह भी शिकायत की है कि शौचालय निर्माण की राशि भी उन्हें पूरी नहीं मिली और ठगी गई है।
गरीबों के नाम पर फर्जीवाड़ा
स्थानीय ग्रामीणों ने इस पूरे घोटाले की पोल खोली है। रुआब खान, गोपाल सिंह, मधुसूदन, संतोष धाकड़, और जलील खान जैसे कई मजदूरों ने खुलकर बताया कि उनके नाम पर मनरेगा में फर्जी भुगतान कर दिया गया है, जबकि उन्होंने उस अवधि में कोई काम ही नहीं किया। यह स्पष्ट करता है कि जॉब कार्ड, मस्टर रोल और भुगतान रिकॉर्ड सभी फर्जी तरीके से तैयार किए जा रहे हैं।
आरोप है कि महिला सरपंच के पति संदीप राय और सचिव अपनी राजनीतिक पहुंच का इस्तेमाल करके इस भ्रष्टाचार को वर्षों से खुलेआम अंजाम दे रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नेताओं और उच्च अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह 'भूतिया खेल' इतने लंबे समय तक नहीं चल सकता था।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक अधिकारियों पर है। क्या उनकी नाक के नीचे यह महाघोटाला यूं ही चलता रहेगा? क्या अधिकारीगण इस बात से अनजान हैं कि मृत आत्माओं को सरकारी खजाने से मजदूरी बांटी जा रही है? यह उदासीनता या तो लापरवाही की पराकाष्ठा है, या फिर भ्रष्टाचार में गहरी साझेदारी का संकेत।
यदि इस ग्राम पंचायत के मनरेगा और अन्य योजनाओं के दस्तावेजों की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो न केवल लाखों रुपये का गबन सामने आएगा, बल्कि कई सफेदपोश और जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच सकते हैं। इस घोटाले की तुरंत जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठ रही है।