वसीम कुरेशी , रायसेन। मिट्टी की सेहत बिगाड़ने और पर्यावरण को जहरीला बनाने वाली पराली (नरवाई) जलाने की कुप्रथा को खत्म करने के लिए सांची क्षेत्र में एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाया गया है। रायसेन कलेक्टर के सख्त निर्देशों के बाद, कृषि विभाग ने सांची जनपद के ग्राम बागोद में एक विशेष कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया, जहां किसानों को पराली के दानव से निपटने का अचूक हथियार – सुपर सीडर – दिखाया गया।
🚨 जहर नहीं, जीवन है पराली! क्यों न जलाएं फसल अवशेष?
कार्यक्रम की शुरुआत में ही कृषि उप संचालक के.पी. भगत ने किसानों को चेतावनी भरे लहजे में बताया कि पराली जलाना कितना खतरनाक है। उन्होंने भावनात्मक अपील करते हुए कहा, “जब आप पराली जलाते हैं, तो आप सिर्फ धुआं नहीं फैलाते, बल्कि अपनी मिट्टी के डॉक्टर कहे जाने वाले लाखों सूक्ष्म जीवाणुओं को जिंदा जला देते हैं।”
उन्होंने विस्तार से समझाया कि आग लगाने से:
* 🔥 भूमि की उर्वरता घटती है क्योंकि लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
* 💨 वातावरण प्रदूषित होता है, जिससे सांस की बीमारियां बढ़ती हैं।
* 🐄 पशुओं के चारे की गंभीर कमी होती है।
* 🚧 आस-पास के खेतों और बिजली के खंभों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है।
भगत ने साफ शब्दों में कहा कि पराली कूड़ा नहीं है, बल्कि खेत का खजाना है। इसे जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाना सबसे समझदारी भरा कदम है।
🚜 सांची में हुआ 'सुपर शो': पराली प्रबंधन का लाइव डेमो
संगोष्ठी का सबसे आकर्षक हिस्सा था कृषि यंत्रों का लाइव प्रदर्शन। सहायक कृषि यंत्री बी.एस. कोठारी की टीम ने गांव के कृषक जुबेर रहमान के खेत को चुना और वहां सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और रोटावेटर की एक भव्य प्रदर्शनी लगाई।
सुपर सीडर को खेत में चलाकर दिखाया गया कि कैसे यह शक्तिशाली मशीन चंद मिनटों में खड़ी पराली को बारीक टुकड़ों में काटकर मिट्टी के साथ पूरी तरह मिला देती है।
एक किसान ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, "पहले हम सोचते थे कि इसे जलाए बिना अगली फसल कैसे बोएंगे। लेकिन इस सुपर सीडर ने तो कमाल कर दिया। अब पराली जलाना एक तरह से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना लगता है।" लाइव प्रदर्शन को देखकर सभी किसानों ने संतुष्टि जताई और आने वाले सीजन में इन आधुनिक यंत्रों का उपयोग करने का संकल्प लिया।
🌱 प्राकृतिक खेती ही भविष्य का रास्ता: जैविक खाद पर जोर
इस संगोष्ठी का उद्देश्य केवल पराली प्रबंधन तक सीमित नहीं था। सहायक संचालक कृषि सुनील सोने ने किसानों का ध्यान एक और जरूरी मुद्दे की ओर खींचा: रासायनिक खेती का बढ़ता जहर।
उन्होंने किसानों को प्रेरित किया कि वे धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों को छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें। सोने ने 'प्राकृतिक नुस्खे' बताते हुए कहा, “आपके घर में ही गोबर, गौमूत्र, और नीम की पत्तियां जैसी जादुई चीजें मौजूद हैं। इनका उपयोग करके आप शुद्ध, स्वास्थ्यवर्धक और लागत-मुक्त फसल उगा सकते हैं।”
उन्होंने जोर दिया कि पराली को मिट्टी में मिलाने से जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ेगी, जो रासायनिक खाद पर आपकी निर्भरता को अपने आप कम कर देगा।
🌟 निष्कर्ष: किसानों ने लिया 'जमीन बचाओ' का संकल्प
ग्राम बागोद के कृषक संगोष्ठी ने यह सिद्ध कर दिया कि जागरूकता और सही तकनीक से पुरानी हानिकारक प्रथाओं को बदला जा सकता है। किसानों ने मिट्टी को बचाने और पर्यावरण को स्वच्छ रखने का संकल्प लिया। कृषि विभाग की यह पहल 'गो ग्रीन, ग्रो बेटर' के नारे को सांची के खेतों तक पहुंचाने में सफल रही है।