भोपाल/इंदौर: मध्य प्रदेश में नल से जल देने का दावा अब जानलेवा साबित हो रहा है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। इस त्रासदी के बीच केंद्र सरकार की 'जल जीवन मिशन' रिपोर्ट ने जो खुलासा किया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में एक-तिहाई से अधिक पानी इंसानों के इस्तेमाल के लायक ही नहीं है।
अस्पतालों और स्कूलों में ‘सफेद जहर’
4 जनवरी 2026 को जारी 'फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट' के आंकड़े डराने वाले हैं। मध्य प्रदेश में पानी की शुद्धता का स्तर राष्ट्रीय औसत (76%) के मुकाबले गिरकर महज 63.3% पर आ गया है। यानी करीब 37% पानी में या तो घातक बैक्टीरिया हैं या फिर जानलेवा रसायन।
सबसे शर्मनाक स्थिति उन जगहों की है जिन्हें हम 'सुरक्षित' मानते हैं:
* सरकारी अस्पताल: मध्य प्रदेश के अस्पतालों में पानी के केवल 12% नमूने ही जांच में पास हुए। इसका मतलब है कि 88% अस्पतालों में मरीजों को दूषित पानी दिया जा रहा है।
* स्कूल: राज्य के 26.7% स्कूलों में बच्चे हर दिन वही पानी पी रहे हैं जो उन्हें बीमार बना रहा है।
इंदौर मॉडल की खुली पोल: 100% नल, पर पानी 67% दूषित
इंदौर को कागजों पर 100% नल कनेक्शन वाला जिला घोषित किया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि यहाँ केवल 33% घरों को ही सुरक्षित पानी मिल रहा है। भागीरथपुरा की घटना इसी 'सिस्टम जनित त्रासदी' का नतीजा है, जहाँ दूषित पानी ने 20 लोगों की जान ले ली और 16 लोग अभी भी आईसीयू में वेंटिलेटर पर हैं।
इन जिलों में 'जीरो' है वाटर क्वालिटी
रिपोर्ट के मुताबिक, अनूपपुर और डिंडोरी जैसे जिलों में पानी की स्थिति इतनी भयावह है कि वहां एक भी नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया। इसके अलावा बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा में 50% से अधिक पानी के सैंपल फेल हो गए हैं। राज्य में केवल 31.5% घरों में ही नल कनेक्शन हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 70.9% है। जहाँ पाइपलाइन बिछी भी है, वहां हर चौथे घर में नल खराब है या पानी ही नहीं आता।
हाई कोर्ट सख्त: 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी' का ऐलान
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस गंभीर स्थिति का संज्ञान लेते हुए इसे 'सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' (Public Health Emergency) घोषित कर दिया है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पानी पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसका सरकार उल्लंघन कर रही है।”
केंद्र सरकार ने भी राज्य को चेतावनी दी है कि यदि पानी की गुणवत्ता में तत्काल सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले बजट में कटौती की जा सकती है।