
इंदौर। मध्य प्रदेश ग्रामीण बैंक में 'सॉल्वर' बैठाकर फर्जी तरीके से बैंक अधिकारी बनने वाले 11 आरोपियों को करारा झटका लगा है। इंदौर स्थित सीबीआई (CBI) के विशेष न्यायाधीश रूपम वेदी की कोर्ट ने सभी 11 आरोपियों की जमानत अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने माना कि यह मामला गंभीर है और विवेचना के दौरान आरोपियों को राहत देना न्यायहित में नहीं होगा।
सॉल्वर का सहारा लेकर बने थे 'साहब'
यह पूरा मामला किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। आरोप है कि इन अभ्यर्थियों ने IBPS (इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सनल सिलेक्शन) की परीक्षा खुद देने के बजाय अपनी जगह 'सॉल्वर' (दूसरे व्यक्ति) को बैठाया था। मोटी रकम देकर परीक्षा पास की और बैंक में अधिकारी की कुर्सी भी हथिया ली। लेकिन, जब बायोमेट्रिक मिलान की बारी आई, तो सिस्टम ने इनकी पोल खोल दी।
इन 11 'फर्जी' अधिकारियों की जमानत हुई निरस्त
जमानत याचिका खारिज होने वाले आरोपियों में राजस्थान और बिहार के युवक शामिल हैं:
सवाई माधोपुर (राजस्थान): रूपलाल मीणा, मुनेश कुमार मीणा, आशीष कुमार मीणा, विमलेश मीणा।
करौली (राजस्थान): रवि कुमार मीणा, शिवकेश मीणा, आलोक कुमार मीणा।
दौसा (राजस्थान): विजय सिंह मीणा, सुरेश चंद्र सैनी।
भरतपुर (राजस्थान): जितेंद्र सिंह।
समस्तीपुर (बिहार): कुमार निखिल पांडे।
कैसे खुली पोल? बायोमेट्रिक ने बिगाड़ा खेल
मध्य प्रदेश ग्रामीण बैंक में जॉइनिंग के बाद जब IBPS से प्राप्त सूचना के आधार पर बैंक ने अधिकारियों का बायोमेट्रिक पुन: सत्यापन (IRIS, फिंगरप्रिंट और फोटो) कराया, तो हड़कंप मच गया। परीक्षा देने वाले शख्स और नौकरी कर रहे शख्स के बायोमेट्रिक डेटा में जमीन-आसमान का अंतर पाया गया।
सीबीआई ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए 9 जनवरी 2026 को राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। जांच में टीसीएस (TCS) का भी सहयोग लिया गया, जिसमें 11 अधिकारियों के फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई। इसके बाद 23 फरवरी 2026 को इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
CBI की दलील: 'अभी असली सॉल्वर का पकड़ा जाना बाकी है'
सीबीआई की ओर से विशेष लोक अभियोजक चंद्रपाल ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट में तर्क दिया कि:
> "प्रकरण की विवेचना अभी बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। मुख्य सॉल्वर (जिन्होंने परीक्षा दी थी) अभी भी फरार हैं। यदि इन आरोपियों को जमानत दी गई, तो ये साक्ष्यों को प्रभावित कर सकते हैं और जांच में बाधा डाल सकते हैं।"
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कोर्ट ने अभियोजन के तर्कों से सहमति जताते हुए सभी आरोपियों को जेल में ही रखने का फैसला सुनाया। इस कार्रवाई से उन गिरोहों में हड़कंप मच गया है जो सरकारी नौकरियों में सेंधमारी का काला कारोबार करते हैं।