
विदिशा (जैन डेस्क)। जीवन की भाग-दौड़ और भौतिक सुखों के पीछे की अंधी दौड़ में भटक रहे मनुष्यों को जैन संत मुनि श्री संभवसागर महाराज ने एक अविनाशी सत्य से परिचित कराया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक संसार, शरीर और भोगों के प्रति अरुचि (विरक्ति) पैदा नहीं होती, तब तक धन, संपत्ति और बड़े से बड़े पद का मोह समाप्त नहीं हो सकता। यह मोह ही आत्मा को अंतर्यात्रा से रोकता है।
मुनि श्री ने अपने ओजस्वी प्रवचन में "जैनत्व का इतिहास" पर प्रकाश डालते हुए भारत के महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के वैराग्य की गाथा सुनाई, जिसने हजारों वर्षों बाद भी वैराग्य मार्ग पर चलने वालों के लिए एक अमिट उदाहरण स्थापित किया है।
सम्राट चंद्रगुप्त: जब राजपाट से बड़ा हुआ आत्म-कल्याण
मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि सम्राट चंद्रगुप्त वह शख्सियत थे, जिनके अधीन उस समय कई छोटे राजा शासन करते थे और उनका वैभव पूरे भारत पर फैला हुआ था। लेकिन, जब उन्हें महसूस हुआ कि यह संसार नश्वर है, शरीर क्षणभंगुर है और भोगों में कोई शाश्वत सुख नहीं है, तब उन्हें इन सबसे अरुचि हुई।
उन्होंने तुरंत अपना विशाल साम्राज्य त्याग दिया। अंतरात्मा की यात्रा और आत्म-कल्याण के लिए उन्होंने दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान किया और श्रवणबेलगोला में सर्वश्रेष्ठ आचार्य भद्रबाहु स्वामी के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया। सम्राट ने दिगंबर मुनि के रूप में दीक्षा धारण कर ली और सर्वोच्च मार्ग अपनाया।
मुनि श्री ने जोर देकर कहा: “संसार, शरीर और भोगों से जब तक विरक्ति नहीं होगी, तब तक आप अंतर्यात्रा नहीं कर सकते।”
इच्छाओं पर विराम: मुनि बनने की पहली सीढ़ी
मुनि श्री ने सभी श्रोताओं को आत्म-कल्याण का एक व्यावहारिक मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को वैराग्य की भावना तो धारण करनी ही चाहिए। इस भावना से कम से कम कर्मों की गांठे थोड़ी तो ढीली होंगी और अंततः अविनाशी मोक्ष पद प्राप्त होने का मार्ग प्रशस्त होगा।
इच्छाओं के जाल पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आप कितनी भी कोशिश कर लें, अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं कर सकते, क्योंकि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। लेकिन, बुद्धिमानी इसी में है कि उन इच्छाओं पर थोड़ा विराम लगाया जा सकता है।
मुनि श्री ने कहा, भले ही आप अभी मुनि या आर्यिका पद धारण न कर सकें, लेकिन वैराग्य की भावना तो कर ही सकते हैं। आज आप वैराग्य की भावना करेंगे, तो धीरे-धीरे इच्छाओं पर रोक लगेगी और आप कम से कम वृत्तिक श्रावक या श्राविका तो बन ही जाएंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब हम इस भव में एक सच्चे वृत्तिक श्रावक बनेंगे, तभी हम अगली पर्याय में मुनि या आर्यिका पद को धारण कर अपना वास्तविक उद्धार करने में सक्षम होंगे।
इस दौरान, मुनि श्री ने एक प्रेरणादायक सूक्ति भी कही: "जो कर्म में सूर है, वही धर्म में सूर है।" यानी, जो व्यक्ति अपने कार्यों में पराक्रमी और साहसी है, वही धर्म मार्ग पर भी उतनी ही दृढ़ता से चल सकता है।
पूजन, प्रश्नमंच और उपस्थिति
प्रवचन के पूर्व, जैन मिलन महिला मंडल की सदस्याओं ने आचार्य गुरुदेव एवं मुनि श्री की अष्ट द्रव्यों से भक्तिपूर्वक पूजन की। प्रवचन के समापन के बाद, मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने एक रोचक प्रश्नमंच का आयोजन किया, जिसमें सही जवाब देने वाले श्रद्धालुओं को पुरस्कृत किया गया।
कार्यक्रम का संचालन मुकेश जैन 'बड़ाघर' ने किया। इस अवसर पर मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष संजय सेठ, महेंद्र बंट, शीतलधाम अध्यक्ष सचिन जैन, सकल दिगंबर जैन समाज अध्यक्ष शैलेंद्र चौधरी, प्रवक्ता अविनाश जैन, अनिरुद्ध सराफ और अशोक अरिहंत समेत अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे।