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महोबा में रूह कंपा देने वाली दरिंदगी: 5 साल तक 'कालकोठरी' में कैद रहे पिता-बेटी, भूख-प्यास से तड़पकर बुजुर्ग की मौत

2026-01-01  Baby jain  283 views

ImgResizer_1767233748387महोबा: उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को तार-तार कर दिया है। जिस घर को बुजुर्ग ने अपनी मेहनत की कमाई से सजाया था, वही घर उनके लिए 'यातना गृह' बन गया। रेलवे से रिटायर्ड एक सीनियर क्लर्क और उनकी दिव्यांग बेटी को उन्हीं के नौकर दंपती ने 5 साल तक बंधक बनाकर रखा। लालच की इस खौफनाक दास्तान का अंत बुजुर्ग की दर्दनाक मौत और बेटी की कंकाल जैसी हालत के साथ हुआ।

संपत्ति के लालच में 'भक्षक' बने रक्षक

रेलवे से रिटायर्ड सीनियर क्लर्क ओमप्रकाश सिंह ने बुढ़ापे के सहारे के लिए घर में एक नौकर और उसकी पत्नी को रखा था। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिन हाथों को वो वेतन दे रहे हैं, वही हाथ उनकी गर्दन दबाने की कोशिश करेंगे। आरोप है कि नौकर दंपती की नजर ओमप्रकाश की संपत्ति और पेंशन पर थी। इसे हड़पने के लिए उन्होंने बुजुर्ग और उनकी 27 वर्षीय दिव्यांग बेटी को घर के ही एक अंधेरे कमरे में कैद कर दिया।

5 साल का नरक: न खाना मिला, न दवा

पिछले 5 वर्षों से यह पिता-बेटी सूरज की रोशनी को तरस गए थे। सूत्रों के अनुसार, नौकर दंपती उन्हें न तो पर्याप्त खाना देते थे और न ही पानी। बीमारी की हालत में इलाज मिलना तो दूर, उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से इस कदर प्रताड़ित किया गया कि ओमप्रकाश सिंह का शरीर जवाब दे गया और उन्होंने दम तोड़ दिया।

जब मोहल्ले वालों को अनहोनी की आशंका हुई और पुलिस ने छापेमारी की, तो अंदर का नजारा देखकर अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए। 27 साल की दिव्यांग बेटी भूख और प्रताड़ना के कारण इस कदर जर्जर हो चुकी थी कि वह 80 साल की बुजुर्ग नजर आ रही थी। शरीर में मांस के नाम पर सिर्फ हड्डियां बची थीं।

पुलिस की कार्रवाई और मोहल्ले का आक्रोश

स्थानीय लोगों की सजगता से इस कांड का पर्दाफाश हुआ। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी नौकर दंपती को गिरफ्तार कर लिया है। पीड़िता को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। सामाजिक संगठनों ने इस घटना को 'मानवीयता की हत्या' करार देते हुए आरोपियों को फांसी की सजा देने की मांग की है।

सिस्टम पर उठते सवाल: कहां थी पुलिस?

इस घटना ने स्थानीय पुलिस और खुफिया तंत्र की पोल खोल दी है।

 * 5 साल तक पड़ोस में इतना बड़ा जुल्म होता रहा और प्रशासन को भनक तक नहीं लगी?

 * रिटायर्ड कर्मचारी की पेंशन और बैंक खातों के ट्रांजैक्शन की निगरानी क्यों नहीं हुई?

 * दिव्यांगों की सुरक्षा के लिए बने दावे जमीनी स्तर पर कितने खोखले हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बीट पुलिसिंग मजबूत होती, तो शायद ओमप्रकाश सिंह आज जीवित होते।

जनता की मांग: फास्ट ट्रैक कोर्ट में चले केस

महोबा की जनता में भारी रोष है। लोगों का कहना है कि इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में ले जाया जाए ताकि पीड़िता को जल्द से जल्द न्याय मिल सके। साथ ही, प्रशासन से मांग की गई है कि दिव्यांग बेटी के इलाज और भविष्य की जिम्मेदारी सरकार उठाए।

यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है। अपने आसपास रहने वाले बुजुर्गों और अकेले रहने वाले परिवारों की सुध लेना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है। लालच ने एक हस्ते-खेलते परिवार को कब्रिस्तान बना दिया, जिसकी भरपाई नामुमकिन है।


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