
बाबड़िया कला, दि. जैन मंदिर: "यह मंदिर मेरा है, ये मेरे भगवान हैं, मैं यहां का पदाधिकारी हूँ, मेरे बिना यहां एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।" ऐसे विचार अक्सर उन लोगों के मन में भी आते हैं, जो भगवान के चरणों में झुकते हैं। मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने बाबड़िया कला दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में इन्हीं विचारों पर गहरा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि अहंकार एक ऐसी दीवार है, जो व्यक्ति को प्रभु से पूरी तरह जुड़ने नहीं देती। हम भले ही शारीरिक रूप से ईश्वर के सामने झुक जाएं, लेकिन यदि मन में अकड़ है, तो वह भक्ति व्यर्थ है।
अहंकार और भक्ति का विरोधाभास
मुनिश्री ने कहा कि जब हम "यह मेरा मंदिर है" या "यह मेरे भगवान हैं" जैसी सोच में फंस जाते हैं, तो हम अपने सभी अच्छे कर्मों पर पानी फेर देते हैं। व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि भगवान और उनका धाम किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं हैं। यह एक ऐसी जगह है, जहां हर कोई अपनी श्रद्धा लेकर आता है।
उन्होंने आगे कहा कि विनम्र व्यक्ति श्रद्धाशील होता है। वह किसी को झुकाता नहीं, बल्कि स्वयं झुक जाता है। यही सच्ची भक्ति का सार है। मुनिश्री ने चार शब्दों के महत्व को समझाया: झुकना, झुकाना, मुड़ना और मोड़ना। उन्होंने कहा कि झुकने में उपलब्धि है, जबकि झुकाने में पीड़ा। जो व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है, उसे झुकना सीखना चाहिए।
‘जो झुकता है, सारी सृष्टि उसके चरणों में न्योछावर होती है’
मुनिश्री ने एक बहुत ही मार्मिक बात कही, "जो झुकना जानता है, सारी सृष्टि उसके चरणों में न्योछावर हो जाती है। और जो दूसरों को झुकाना चाहता है, सृष्टि उसे उखाड़ कर फेंक देती है।" यह उपदेश हमें सिखाता है कि अहंकार हमें कमजोर और अकेला बनाता है, जबकि विनम्रता हमें शक्ति और समर्थन देती है।
हर व्यक्ति अपने आप को सबसे ऊपर देखना चाहता है। मुनिश्री ने इसे सबसे बड़ी अज्ञानता बताया। उन्होंने कहा, "अपनी एक काल्पनिक छवि को सच मान लेना ही सबसे बड़ी मूर्खता है।" अहंकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह व्यक्ति को झुकने नहीं देता, भले ही वह पूरी तरह से टूट जाए।
अहंकार की एक हास्यास्पद कहानी
मुनिश्री ने अपने उपदेश को एक रोचक कहानी से और स्पष्ट किया। उन्होंने एक ऐसे पति-पत्नी का उदाहरण दिया, जिनके बीच बोलचाल बंद हो गई थी। पति को सुबह जल्दी मीटिंग में जाना था, इसलिए उसने पत्नी के लिए एक पर्ची लिखी, "मुझे सुबह 4 बजे उठा देना।" पत्नी ने सुबह 4 बजे उठकर अपनी दैनिक क्रियाएं कीं और फिर एक पर्ची लिखकर पति के तकिए पर रख दी, "4 बज गए हैं, उठ जाइए।" जब पति 7 बजे उठा, तो वह गुस्सा हुआ, लेकिन जब उसे पर्ची मिली, तो वह समझ गया कि पत्नी का अहंकार भी उसके जैसा ही है।
मुनिश्री ने समझाया कि यदि मन नहीं झुका और व्यक्ति ने खुद को मोड़ने की कला नहीं सीखी, तो जीवन में संघर्ष और कड़वाहट बनी रहेगी। जिसने अपने मन को मोड़ना सीख लिया, उसके जीवन में हमेशा स्वीकारता का भाव होता है और उसका जीवन कभी रुकता नहीं।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनिसंघ का मंगल विहार अब 'संस्कार उपवन प्राइड' की ओर हुआ है। यहां तीन दिवसीय विशेष कार्यक्रम होगा, जिसमें सुबह 8:30 बजे प्रवचन और शाम 6:20 बजे शंका समाधान का सत्र होगा।