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जीवन का 'सबसे दुर्लभ लाभ' शांति! मुनि प्रमाणसागर बोले- “भगवान को हृदय में बिठा लो, कायाकल्प हो जाएगा”

2025-11-01  Baby jain  323 views

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भोपाल, मध्य प्रदेश: जैन समाज के प्रख्यात संत और गुणायतन एवं विद्या प्रमाण गुरुकुलम् के प्रणेता मुनि प्रमाणसागर महाराज ने भोपाल में आयोजित धर्मसभा में मानव जीवन के सबसे महत्वपूर्ण विषय—आंतरिक शांति—पर महत्वपूर्ण उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बाहरी भौतिक संसाधनों को प्राप्त करना कठिन नहीं है, लेकिन अंदर की शांति की उपलब्धि ही जीवन का सबसे दुर्लभ लाभ है।

मुनि प्रमाणसागर ने ये विचार दिगंबर जैन मंदिर, झिरनों में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा के दौरान व्यक्त किए, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

झिरनों का विशेष आकर्षण: ‘यहां ध्यान लगाना नहीं पड़ता, अपने आप लग जाता है’

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने जानकारी दी कि प्रातःकाल मूलनायक भगवान नेमीनाथ स्वामी का मस्तकाभिषेक और शांतिधारा मुनि के मुखारविंद से संपन्न हुई, जिसके बाद नित्यनियम पूजन और गणधर विलयविधान हुआ।

अपने प्रवचन में, मुनि प्रमाणसागर ने कहा कि भगवान की उपस्थिति का अहसास कराने कोई और नहीं आएगा; यह हमारे अंदर की श्रद्धा ही है जो प्रभु की उपस्थिति का अनुभव कराएगी। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा, “मूर्ति के नहीं, मूर्तिमान के दर्शन करो। जिनविम्व के दर्शन से ही सम्यक् दर्शन प्राप्त होता है।”

मुनि ने झिरनों मंदिर की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह भगवान नेमीनाथ का एक ऐसा पावन दरबार है, जहां आते ही मन आनंद और शांति से भर जाता है। उन्होंने अपनी पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि उन्होंने यहां 1995 का चातुर्मास एक अलग अनुभूति के साथ बिताया था। मुनि प्रमाणसागर ने कहा, “यहां प्रभु के चरणों में ध्यान लगाना नहीं पड़ता, अपने आप लग जाता है, मात्र बैठने की देर है।”

एकलव्य का आदर्श: हृदय में समर्पण ही सच्ची भक्ति

मुनि प्रमाणसागर ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए जीवन के सार को समझाया। उन्होंने कहा, “हम और कितना पा रहे हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। हमारे अंदर कितनी शांति और संतुष्टि है, यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।”

उन्होंने भगवान की शरण में आने का सच्चा अर्थ समझाया। उन्होंने कहा, “शरण में आने का मतलब है भगवान को अपने हृदय में वैठा लो। जिस दिन भगवान आपके हृदय में समाहित हो जाएंगे, समझना आपके जीवन का कायाकल्प हो गया।”

भक्ति की शक्ति का वर्णन करते हुए मुनि ने कहा कि लोग पूरा जीवन भक्ति करते हुए बिता देते हैं, लेकिन अपने हृदय में भगवान की उपस्थिति का अहसास नहीं कर पाते। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि वे भगवान के पास तो आए, लेकिन दूर-दूर ही रहे।

इस सिद्धांत को समझाने के लिए उन्होंने एकलव्य के आदर्श का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जो ज्ञान गुरु द्रोणाचार्य के पास रहकर भी अर्जुन को प्राप्त नहीं हुआ, वह एकलव्य ने प्राप्त कर लिया। इसका सबसे बड़ा कारण था: अर्जुन द्रोणाचार्य के पास था, लेकिन एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपने हृदय में बसा रखा था। उन्होंने निष्कर्ष दिया कि भगवान के पास जाने और भगवान को पास बिठाने में यही अंतर है।

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि कार्यक्रम का संयोजन दिगंबर जैन पंचायत चौक मंदिर, भोपाल ने किया। अध्यक्ष मनोज जैन बांगा ने अपनी टीम के साथ मुनिसंघ को श्रीफल समर्पित किया और चौक मंदिर के लिए निवेदन किया। मुनि प्रमाणसागर का रात्रि विश्राम टी.टी. नगर जैन मंदिर में हो रहा है।


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