
शुभम जैन विदिशा में लटेरी की जेल में विगत दिनों कुछ अलग ही महफिल सजी हुई थी। कानून के नियम कायदे को ताक पर रखकर जेल के अंदर ही इफ्तार पार्टी की धूम मची। लेकिन बात यहीं तक नहीं रुकी—मोबाइल निकला, सेल्फी खींची गई, वीडियो बने और फिर सोशल मीडिया पर धमाका! जैसे ही तस्वीरें वायरल हुईं, जेल प्रशासन के चेहरे से हवाईयां उड़ गईं। सवाल यह उठता है कि जहां परिजनों को कैदियों से मिलने के लिए कांच के पार से टेलीफोन पर बात करने की अनुमति होती है, वहां ये मोबाइल फोन कहां से टपक पड़ा?
जेल में VIP ट्रीटमेंट?
मामला बस फोटो तक नहीं रुका। जेल के अंदर इस तरह मोबाइल का पहुंचना, खुलेआम वीडियो शूट करना यह दिखाता है कि जेल के नियमों का खुलेआम मजाक बनाया जा रहा है। जो जेलर अपराधियों पर नजर रखने के लिए तैनात हैं, वही अपराधियों संग तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त नजर आ रहे हैं। मानो जेल नहीं, कोई पार्टी हॉल हो!
प्रशासन की चुप्पी, जनता की हैरानी
जब मामला तूल पकड़ने लगा, तो जेल प्रशासन ने पल्ला झाड़ने में ही भलाई समझी। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं, लेकिन तस्वीरें सबकुछ कह रही हैं। अब जब जनता और मीडिया ने सवालों की बौछार कर दी, तो विदिशा के कलेक्टर साहब जागे और जांच की बात करने लगे।
कानून का मखौल
यह मामला सिर्फ एक जेल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगा रहा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 183 (भाग VI) के तहत जेल में किसी भी प्रकार की गुप्त रिकॉर्डिंग प्रतिबंधित है। ऐसा करने पर पांच साल तक की सजा हो सकती है, लेकिन यहां तो पूरी फिल्म ही बन गई!
अब देखना यह है कि यह मामला सिर्फ जांच तक सीमित रहेगा या फिर असली जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी? या फिर हर बार की तरह यह भी सिर्फ "फोटो खिंचवाने तक" ही सीमित रह जाएगा?