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इतिहास तोड़ने वालों को नहीं, जोड़ने वालों को याद रखता है: मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

2025-09-29  BHOPAL REPORTER VIJAY SHARMA  575 views

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भोपाल (अवधपुरी): जैन धर्म और समाज में बढ़ते विखंडन पर चिंता ज़ाहिर करते हुए, प्रख्यात दिगम्बर जैन मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने एक प्रेरणादायक और सटीक संदेश दिया है। उन्होंने कहा, “इतिहास तोड़ने वालों को नहीं, जोड़ने वालों को याद रखता है।”

भोपाल के अवधपुरी में शंका समाधान कार्यक्रम के दौरान पुणे से आए 'जैन युवा संघ' के युवक-युवतियों ने मुनि श्री से जैन धर्म के इतिहास और वर्तमान विखंडन से जुड़े तीखे सवाल किए, जिसका मुनि श्री ने बेहद स्पष्ट और प्रेरक उत्तर दिया।

'कैंची नहीं, सुई बनो' - विखंडन रोकने का महामंत्र

मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि संकीर्ण मानसिकता और नकारात्मक सोच पहले भी जैन धर्म की प्रगति में बाधक थी और आज भी है। उन्होंने आगाह किया कि यदि हम सकारात्मक सोच और सावधानी के साथ आगे बढ़ें तो हो रहे विखंडन को रोका जा सकता है।

मुनि श्री ने आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के एक मंत्र को कविता के माध्यम से समझाते हुए कहा, “कैंची नहीं सुई बनो।”

 * कैंची का काम सीधा काटना या तोड़ना होता है, जो बेहद सरल है।

 * सुई का काम सिलना और जोड़ना होता है, जिसके लिए बहुत श्रम और पसीना बहाना पड़ता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी को तोड़ना तो बहुत सहज होता है, लेकिन जोड़ने में अधिक मेहनत लगती है। इसलिए, यदि हमारी सोच और दृष्टिकोण सकारात्मक और साफ-सुथरा होगा, तभी हम इस विखंडन को रोकने में समर्थ हो सकते हैं। उन्होंने जैन युवाओं को नकारात्मक प्रवृत्तियों और बातों से हमेशा सुरक्षित दूरी बनाकर रखने की सलाह दी ताकि उनका जीवन सुरक्षित रह सके।

जैन युवा संघ की प्रशंसा: मज़ा-मस्ती छोड़ धर्मध्वजा को समर्पित

मुनि श्री ने 'जैन युवा संघ' पुणे के सभी कार्यकर्ताओं की हृदय से प्रशंसा की और उन्हें आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि यह वह दौर है जब युवा पीढ़ी मज़ा और मौज-मस्ती की ओर तेज़ी से अग्रसर है। ऐसे समय में, पुणे के ये युवा अपने तन, मन और धन के साथ स्वयं को धर्मध्वजा को आगे बढ़ाने में समर्पित कर रहे हैं, जो हार्दिक प्रसन्नता का कारण है।

उन्होंने बताया कि यह सभी युवा स्वाध्यायी छात्र हैं और ऑनलाइन माध्यम से जैन धर्म के तत्वज्ञान को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही, ये युवा विशेष रूप से ओडिशा राज्य में बहुतायत में रहने वाली "सराक" जनजाति पर शोध का महत्वपूर्ण कार्य भी कर रहे हैं।

ओडिशा: कला, स्थापत्य और जैन संस्कृति का प्राचीन केंद्र

शोध से जुड़े प्रश्न का उत्तर देते हुए मुनि श्री ने ओडिशा राज्य के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ओडिशा राज्य कला और स्थापत्य कला का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा है और वहाँ पर जैन संस्कृति पुरातन काल से ही स्थापित रही है।

 * सम्राट ऐल खारवेल का कुमारी पर्वत पर अंकित शिलालेख एक पुष्ट दस्तावेज है।

 * वहाँ से निकलने वाली आठवीं शताब्दी की जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि उस काल में जैन धर्म राष्ट्र का प्रतीक था और वहाँ की बहुसंख्यक आबादी इसका अनुपालन करती थी।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन युवाओं के शोध के परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होंगे और प्राचीन जैन इतिहास के अनछुए पहलुओं को सामने लाएंगे।

भारत की सीमाओं से परे जैन धर्म: विस्तार और पतन की कहानी

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न पर, "जैन धर्म भारत तक ही क्यों सीमित, अन्य देशों में क्यों नहीं?" का उत्तर देते हुए मुनि श्री ने जैन धर्म के वैश्विक विस्तार और फिर पतन के कारणों को समझाया।

उन्होंने बताया कि जैन धर्म के प्रवर्तक तीर्थंकर ऋषभदेव के समय संपूर्ण आर्यावर्त क्षेत्र ही भारत था, जिसका विस्तार बहुत बड़ा था। तीर्थंकर भगवान जहाँ तक विचरण कर सकते थे, वहाँ तक गए। इसी कारण भारत के बाहर कई यूरोपीय देशों में भी तीर्थंकर भगवान के अवशेष देखने को मिलते हैं।

हालाँकि, बाद में साधुओं का आवागमन न होने, समुद्री मार्ग में यात्रा की सीमाएँ, और शीत कटिबंध क्षेत्रों में अहिंसाव्रत एवं निर्विवाद चर्या का पालन करने में कठिनाई के कारण एक सीमा से बाहर नहीं जा पाए। इसके बावजूद, कुछ एशियाई देशों में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जैसे "माया संस्कृति" में जैन अवशेष। मुनि श्री ने संकेत दिया कि ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ पहले जैन कल्चर था, जिसमें विद्याधरों की भूमिका मिलती है।

राजनीतिक भूचाल और धार्मिक उन्माद: ह्रास का कारण

मुनि श्री ने जैन धर्म के विस्तार को रोकने में सहायक बनी राजनीतिक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक समय था जब बहुसंख्यक आबादी जैन धर्म का पालन करती थी। बाद में कुछ ऐसे राजनीतिक भूचाल आए, जिससे जैन धर्म बुरी तरह प्रभावित हुआ।

 * राजनीतिक संरक्षण के अभाव में जैन धर्म का ह्रास हुआ।

 * गुप्त वंश तथा कल्चुरी जैन राजाओं के काल तक जैन धर्म स्वर्णिम काल के रूप में रहा।

 * लेकिन मुगलों, शक्यों, तथा यवनों के काल में जैन धर्म का बहुत बड़ा नुकसान हुआ।

 * धार्मिक उन्माद और विद्वेष भी जैन धर्म के पतन का एक बड़ा कारण बना।

अंत में, मुनि श्री ने कहा कि जैन धर्म का मूल उद्देश्य शांति को प्राप्त करना है, और वर्तमान में समूचे विश्व को इसी शांति की आवश्यकता है। हम तत्वज्ञान के माध्यम से अपना उत्कृष्ट योगदान देकर विश्व में अशांति को दूर करने में सहायक हो सकते हैं।

कार्यक्रम का सफल संचालन मुनि श्री संधान सागर महाराज ने किया। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने इस महत्वपूर्ण शंका समाधान कार्यक्रम की जानकारी दी।


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