
भोपाल (अवधपुरी): राजधानी भोपाल के अवधपुरी में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के चतुर्थ दिवस पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। परम पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के पावन सानिध्य में हुए इस ऐतिहासिक आयोजन में उन्होंने गुरुभक्ति और शिष्यत्व के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया। उनका सीधा संदेश था कि सच्ची गुरुभक्ति केवल जय-जयकार में नहीं, बल्कि आचरण में गुरु के आदर्शों को उतारने में है।
गणधर वलय विधान और 'शरद पूर्णिमा' की विशेष शांतिधारा
गुरुवार को विधान के चौथे दिन श्री गणधर वलय विधान की क्रियाएं संपन्न हुईं। मुनि श्री के मुखारविंद से 64 ऋद्धि मंत्रों का समर्पण किया गया, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। सुबह की वेला 'शरद पूर्णिमा' के विशेष अवसर पर और भी पावन हो गई, जब 55 मिनट की विशेष शांतिधारा भगवान के श्री मस्तक पर की गई।
इस भव्य धार्मिक आयोजन में मध्यप्रदेश शासन के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट ने भी एक जैन श्रावक के रूप में भाग लिया और मुनि श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान विदिशा से समग्र पाठशालाओं के लगभग 120 बच्चों और शिक्षकों का समूह भी पूज्य मुनि श्री से आशीर्वाद लेने पहुंचा।
मुनि श्री का 'विद्योदय' कार्यकर्ताओं को विशेष उद्बोधन
विधान के मध्य में जब संपूर्ण भोपाल नगर में वाहनों के माध्यम से धर्म की प्रभावना करते हुए "विद्योदय" के कार्यकर्ता मुनि श्री का आशीर्वाद लेने मंच पर पहुंचे, तो मुनि श्री ने उन्हें संबोधित करते हुए गुरुभक्ति का मर्म समझाया।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि आप सभी गुरुदेव के पक्के अनुयायी बनो। मुनि श्री ने बल देते हुए कहा, "हृदय में गुरुभक्ति तथा आचरण में गुरु के आदर्श दिखना चाहिए।" यह पंक्ति न केवल गुरु की महिमा बताती है, बल्कि एक सच्चे शिष्य का कर्तव्य भी स्पष्ट करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरु की वाणी का मात्र श्रवण नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीना ही वास्तविक भक्ति है।
दीक्षा दिवस ही सच्चा ‘जन्म’
सांसारिक जन्मदिवस मनाने की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने एक अद्वितीय आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि गुरुदेव ने कभी भी भौतिक और सांसारिक जन्मदिन को मनाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया, बल्कि हमेशा दीक्षा दिवस मनाने की प्रेरणा दी।
मुनि श्री ने समझाया, "एक मुनि का जन्म ही दीक्षा के उपरांत होता है। इसलिए, मैं भी कभी सांसारिक जन्म दिवस मनाने को प्रोत्साहित नहीं करता।" हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि इस बहाने गुरुदेव को याद किया गया है, तो इसमें कोई हानि नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि गुरुदेव ने जो आदर्श और प्रेरणा हम लोगों को दी, उनके विचारों और मार्गदर्शन को जन-जन में फैलाया जाए, तथा उनके आचरण को अपने जीवन में साकार किया जाए।
'विद्योदय' का अर्थ और आशीर्वाद
मुनि श्री ने 'विद्योदय' शब्द का शाब्दिक अर्थ समझाते हुए कहा कि विद्या का उदय! यह नाम स्वयं में एक प्रेरणा है। उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा कि आप सभी के जीवन में "विद्या का प्रकाश फैले" और आप सभी इसी प्रकार गुरु की भक्ति करते रहें।
इस पूरे कार्यक्रम में मुनि श्री के साथ मुनि श्री संधानसागर महाराज सहित समस्त क्षुल्लक मंचासीन थे। कार्यक्रम का सफल संचालन बाल ब्र. अशोक भैया, ब्र. अभय भैया, और सहायक अमित वास्तु ने किया। आयोजन में विद्याप्रमाण गुरुकुलम् टीम सहित दिगंबर जैन पंचायत भोपाल के समस्त पदाधिकारी उपस्थित रहे, जिन्होंने इस आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह आयोजन एक बार फिर भोपाल को धर्म और आध्यात्म की दिव्य ऊर्जा से सराबोर कर गया। मुनि श्री के प्रवचन ने सभी उपस्थित श्रावकों को गुरु के प्रति सच्ची निष्ठा और आदर्शों पर चलने की नई दिशा प्रदान की।