
विदिशा/लटेरी: मध्यप्रदेश सरकार जिसे अपनी शिक्षा क्रांति का 'पोस्टर बॉय' बताती थी, उस CM RISE स्कूल मॉडल की लटेरी में धज्जियां उड़ गई हैं। जिस स्कूल की दीवारों को चमकाने में करोड़ों फूंके गए, वहां कक्षा 9वीं के छात्रों का भविष्य अंधकार की गर्त में समा गया है। विदिशा जिले के लटेरी स्थित संदीपनी (सीएम राइज) स्कूल का परिणाम किसी 'शैक्षणिक नरसंहार' से कम नहीं है।
शिक्षा व्यवस्था का शर्मनाक सरेंडर: 332 में से 245 बच्चे हुए फेल
लटेरी के इस हाई-प्रोफाइल सरकारी स्कूल में शिक्षा का स्तर इस कदर गिर चुका है कि कक्षा 9वीं का कुल रिजल्ट मात्र 26% रहा। आंकड़ों पर नजर डालें तो रूह कांप जाती है:
कुल छात्र: 332
उत्तीर्ण: मात्र 87
असफल/रुके हुए: 245
सबसे हैरान करने वाली बात एक विशेष सेक्शन की है, जहाँ 94 बच्चों में से केवल 1 बच्चा पास हो सका। यानी 93 बच्चे सीधे तौर पर फेल हो गए। क्या यह छात्रों की असफलता है या उस सिस्टम की जिसने साल भर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए?
मोटी तनख्वाह, एसी कमरे और शून्य परिणाम!
करोड़ों का बजट, आधुनिक लैब और भारी-भरकम वेतन पाने वाले शिक्षकों की फौज होने के बावजूद यह नतीजा प्रदेश की शिक्षा नीति पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। जब पूरी की पूरी क्लास फेल हो जाए, तो दोष छात्रों के सिर मढ़ना कायरता है। यह सीधे तौर पर Teaching Method और शिक्षकों की योग्यता की विफलता है।
> अभिभावकों का आक्रोश: “जब स्कूल की इमारतें चमक रही हैं, तो क्लास के भीतर पढ़ाई क्यों नहीं हो रही? क्या सरकार सिर्फ पेंट और पुताई के लिए करोड़ों खर्च कर रही है?”
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प्रिंसिपल का अजीबोगरीब तर्क: “बच्चे दीवार फांदकर भाग जाते हैं”
जब इस महा-विफलता पर जवाब मांगा गया, तो संस्था प्रभारी श्यामदास बैरागी ने सारा ठीकरा बच्चों और नए टीचरों पर फोड़ दिया। उनका कहना है कि बच्चे कक्षा 8वीं से कमजोर होकर आते हैं और स्कूल की दीवार फांदकर भाग जाते हैं। साथ ही उन्होंने सोशल साइंस की कॉपी चेक करने वाले 'नए टीचर' को इस खराब रिजल्ट का विलेन बताया। सवाल यह है कि साल भर मॉनिटरिंग के नाम पर अधिकारी क्या कर रहे थे?
कांग्रेस का तीखा हमला: “शिक्षा माफिया का कब्जा”
इस मुद्दे पर सियासत भी गरमा गई है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष मोहित रघुवंशी ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “60 शिक्षकों की फौज और करोड़ों के बजट के बाद ऐसा रिजल्ट शर्मनाक है। ऐसे लापरवाह शिक्षकों को तत्काल घर बैठा देना चाहिए। यह सरकारी तंत्र और शिक्षा माफिया की मिलीभगत का नतीजा है।”
निष्कर्ष: फाइलों में चमक, धरातल पर अंधेरा
भोपाल और दिल्ली की फाइलों में मध्यप्रदेश का जो शिक्षा मॉडल 'नंबर वन' बताया जा रहा है, लटेरी की हकीकत उसे झुठला रही है। अगर 74% बच्चे फेल हो रहे हैं, तो यह व्यवस्था की 'नैतिक हत्या' है। अब देखना यह है कि क्या दोषी अधिकारियों और शिक्षकों पर कार्रवाई होगी, या एक और 'जांच समिति' बनाकर इस मामले को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाएगा।