
क्या आप सोच सकते हैं कि पलक झपकते ही आपके जीवन भर की कमाई एक फेक कॉल से गायब हो सकती है? छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक महिला के साथ ऐसा ही हुआ। खुद को CBI का अधिकारी बताकर कुछ शातिर ठगों ने न सिर्फ उसे बल्कि उसके पूरे परिवार को 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर एक महीने तक खौफ में रखा और लाखों रुपए ऐंठ लिए। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, दुर्ग पुलिस ने लखनऊ तक पीछा कर इन साइबर अपराधियों को कैसे दबोचा, जानिए इस चौंकाने वाले खुलासे में...
दुर्ग, छत्तीसगढ़: आधुनिक युग में जहां डिजिटल क्रांति ने हमारे जीवन को आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधी इसी डिजिटल दुनिया का फायदा उठाकर लोगों को ठगी का शिकार बना रहे हैं। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के नेवई थाना क्षेत्र से सामने आया एक मामला इस बात का जीता-जागता सबूत है कि कैसे धोखेबाज, प्रतिष्ठित सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। एक ऐसा ही खौफनाक मामला सामने आया है, जहां खुद को सीबीआई अधिकारी बताकर ठगों ने एक महिला को 'डिजिटल अरेस्ट' करने का दावा किया और उसके तथा उसके परिवार के करोड़ों रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग के फर्जी केस में फंसाने की धमकी देकर उससे पूरे ₹54 लाख 90 हजार ठग लिए। यह सिर्फ एक धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक महीने तक चला मानसिक अत्याचार था, जिसने एक पूरे परिवार को डरावनी दहशत में जीने पर मजबूर कर दिया।
क्या था 'डिजिटल अरेस्ट' का ये खौफनाक जाल?
पीड़िता, नम्रता चंद्राकर ने नेवई थाने में अपनी आपबीती बताते हुए एक रिपोर्ट दर्ज कराई है, जिसने पुलिस को भी सकते में डाल दिया। नम्रता ने बताया कि 29 अप्रैल 2025 से 29 मई 2025 के बीच, यानी पूरे एक महीने तक, उन्हें और उनके बुजुर्ग पिता को अलग-अलग मोबाइल नंबरों से लगातार कॉल आते रहे। कॉल करने वाले खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का अधिकारी बता रहे थे। उनकी आवाज में एक अजीब-सा रुआब था और उनके बोल सीधे दिमाग पर वार कर रहे थे।
ठगों ने नम्रता और उनके पिता को बताया कि उनके बैंक खाते से दो करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग हुई है। यह सुनकर नम्रता और उनका परिवार दहशत में आ गया। मनी लॉन्ड्रिंग एक गंभीर अपराध है और इसके कानूनी परिणाम बहुत भयावह हो सकते हैं। ठगों ने इसी डर का फायदा उठाया। उन्होंने पीड़िता को विश्वास दिलाया कि अगर वे उनके कहे अनुसार नहीं चलेंगे, तो न केवल उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया जाएगा, बल्कि उनके पूरे परिवार का नाम बदनाम हो जाएगा और उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी।
दहशत में आकर दी संपत्ति की जानकारी, लुटा दी जीवन भर की कमाई
ठगों ने इतनी सफाई से और इतने आत्मविश्वास से बात की कि पीड़िता नम्रता और उनका परिवार पूरी तरह से उनके झांसे में आ गया। उन्हें लगा कि यह वास्तव में कोई सरकारी कार्रवाई है और अगर उन्होंने सहयोग नहीं किया तो वे बड़ी मुसीबत में फंस जाएंगे। इसी डर के माहौल में, नम्रता ने ठगों को अपनी संपत्ति और बैंक खातों से जुड़ी सारी संवेदनशील जानकारी दे दी।
इसके बाद, जो हुआ वो किसी बुरे सपने से कम नहीं था। एक महीने तक, ठगों ने नम्रता को लगातार धमकाया और उन्हें अपने बताए गए बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। एक-एक करके, नम्रता ने अपनी बचत, अपने परिवार की जमा पूंजी, यहां तक कि शायद कहीं से कर्ज लेकर भी, कुल ₹54 लाख 90 हजार उन अज्ञात खातों में ट्रांसफर कर दिए, जिनके पीछे शातिर ठग छिपे हुए थे। हर बार जब पैसा ट्रांसफर होता, तो ठगों का दबाव और बढ़ जाता, जिससे नम्रता को लगता कि वह सही कर रही है और इससे उनके पिता फर्जी केस से बच जाएंगे।
दुर्ग पुलिस की जांबाज कार्रवाई: लखनऊ तक पीछा, 4 ठग गिरफ्तार!
इतनी बड़ी रकम गंवाने के बाद जब ठगों का सिलसिला नहीं रुका और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तब जाकर नम्रता चंद्राकर ने नेवई थाना पहुंचकर अपनी शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलते ही दुर्ग पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर एक विशेष टीम का गठन किया गया। यह मामला सिर्फ धोखाधड़ी का नहीं, बल्कि एक गंभीर साइबर अपराध का था, जिसमें इंटर-स्टेट गिरोह के शामिल होने की आशंका थी।
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए जांच शुरू की। सबसे पहले, उन मोबाइल नंबरों की जानकारी जुटाई गई जिनसे कॉल आए थे। इसके बाद, जिन बैंक खातों में ठगी की रकम ट्रांसफर की गई थी, उनकी भी पूरी डिटेल खंगाली गई। तकनीकी जांच और खुफिया सूचनाओं के आधार पर, पुलिस को जल्द ही अहम सुराग मिल गए। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि सभी आरोपियों के मोबाइल नंबर और बैंक खातों का संबंध उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से था।
बिना समय गंवाए, दुर्ग पुलिस की एक विशेष टीम ने दुर्ग से लखनऊ तक का सफर तय किया। वहां पहुंचकर, स्थानीय पुलिस के सहयोग से, दुर्ग पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया। गहन जांच और सटीक सूचना के आधार पर, पुलिस ने लखनऊ के अलग-अलग ठिकानों से चार शातिर ठगों को धर दबोचा।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान दीपक गुप्ता, राजेश विश्वकर्मा, कृष्ण कुमार और शुभम श्रीवास्तव के रूप में हुई है। पूछताछ में पता चला कि ये सभी लखनऊ के ही निवासी हैं और एक संगठित गिरोह बनाकर साइबर धोखाधड़ी का काम कर रहे थे। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया कि पकड़े गए आरोपियों में से राजेश विश्वकर्मा वह व्यक्ति था, जिसने यूनियन बैंक का खाता उपलब्ध कराया था। यही वह खाता था जिसमें पीड़िता नम्रता चंद्राकर द्वारा ठगी गई 54 लाख 90 हजार रुपये की बड़ी रकम जमा हुई थी। यह राजेश ही था जो इस पूरे खेल में एक अहम कड़ी के रूप में काम कर रहा था।
क्या मिला आरोपियों के पास से? आगे की जांच जारी...
पुलिस ने गिरफ्तार किए गए आरोपियों के पास से कई महत्वपूर्ण सबूत जब्त किए हैं, जिनमें उनके मोबाइल फोन और आधार कार्ड शामिल हैं। ये इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस अक्सर साइबर अपराधों में अहम सुराग होते हैं। सभी चारों आरोपियों को अब रिमांड पर लिया गया है और उनसे आगे की पूछताछ की जा रही है। पुलिस का मानना है कि इस गिरोह के पीछे कोई और बड़ा मास्टरमाइंड हो सकता है, और हो सकता है कि ये आरोपी सिर्फ मोहरे हों।
दुर्ग पुलिस अब इस मामले की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि क्या इस गिरोह ने ऐसे और भी लोगों को ठगा है और इनके नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल हैं। इस तरह के 'डिजिटल अरेस्ट' और 'मनी लॉन्ड्रिंग' के फर्जीवाड़े आम होते जा रहे हैं, और लोगों को ऐसे साइबर हमलों से बचने के लिए बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
यह मामला एक चेतावनी है कि कैसे अपराधी हमारी डिजिटल निर्भरता का फायदा उठा रहे हैं। पुलिस की त्वरित कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन नागरिकों को भी अपनी निजी जानकारी और वित्तीय विवरण साझा करने से पहले दस बार सोचने की जरूरत है। किसी भी अज्ञात कॉल या संदेश पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, खासकर जब वे बैंक खाते, आधार या अन्य संवेदनशील जानकारी मांगें। याद रखें, कोई भी सरकारी एजेंसी या बैंक आपसे कभी भी फोन पर ऐसी जानकारी नहीं मांगेगा। साइबर सुरक्षा ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।