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असत्य पर सत्य की विजय का महासंग्राम: दशहरा पर्व बना शौर्य का साक्षी

2025-10-03  BHOPAL REPORTER VIJAY SHARMA  618 views

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🔥 सांची:  वसीम कुरेशी 

भारत भूमि पर हर पर्व एक गहरे संदेश और महान परंपरा को समेटे हुए आता है। इन्हीं में से एक है विजयादशमी अथवा दशहरा, जो न सिर्फ लंकापति रावण पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की विजय का प्रतीक है, बल्कि असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का महाघोष भी है। इस साल भी यह पर्व समूचे देश में पूर्ण श्रद्धा, उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया, लेकिन सांची नगर में यह परंपरा एक विशेष शौर्य और संकल्प के साथ पुनर्जीवित हुई, जिसका केंद्र था स्थानीय पुलिस थाना।

सांची थाने में गूंजा शौर्य का मंत्र: विधि-विधान से संपन्न हुआ शस्त्र पूजन

दशहरे के दिन शस्त्रों की पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है। यह परंपरा केवल लोहे और धातु की पूजा नहीं, बल्कि शक्ति, संयम और सुरक्षा के प्रति समर्पण का भाव जगाती है। इसी कड़ी में, सांची नगर के पुलिस थाने में एक अत्यंत ही धार्मिक और गरिमामय वातावरण में शस्त्र पूजन का कार्यक्रम संपन्न हुआ।

थाना परिसर में इस विशेष आयोजन को थाना प्रभारी जे.पी. त्रिपाठी के कुशल नेतृत्व में अंजाम दिया गया। त्रिपाठी जी ने स्वयं आगे आकर इस महत्वपूर्ण परंपरा का निर्वहन किया, जो कानून के रखवालों के लिए उनके कर्त्तव्य और शक्ति के प्रति आदर को दर्शाता है।

पूजन के लिए विख्यात पंडित आशीष शर्मा को आमंत्रित किया गया। पंडित जी ने वैदिक मंत्रोच्चार और पूरे विधि-विधान के साथ शस्त्रों की पूजा-अर्चना की। मंत्रों की गूंज और धूप-दीप की सुगंध से पूरा थाना परिसर एक धार्मिक ऊर्जा से भर उठा। पारंपरिक रूप से शस्त्रों को सुंदर वस्त्राभूषण से सजाया गया और तत्पश्चात उनकी आरती संपन्न हुई। इस अवसर पर थाने का पूरा स्टाफ पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ उपस्थित रहा, जिसने न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान को पूरा किया, बल्कि अपने दैनिक कर्त्तव्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों के प्रति भी अपना सम्मान प्रकट किया।

शस्त्र पूजन: परंपरा, इतिहास और एक गहरा सामाजिक संदेश

शस्त्र पूजन की यह परंपरा राजपूतों और मराठाओं जैसे वीर समुदायों में विशेष रूप से प्रचलित रही है। इतिहासकार बताते हैं कि दशहरे का दिन 'विजय मुहूर्त' के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन क्षत्रिय और योद्धा अपने शस्त्रों की पूजा करते थे, उन्हें साफ करते थे और उनका नववर्ष प्रारंभ मानते हुए उन्हें चलाकर (उनका प्रदर्शन करके) देखते थे। यह एक तरह से आने वाले वर्ष के लिए सुरक्षा और विजय का संकल्प लेना होता था।

आधुनिक संदर्भ में, यह परंपरा आज भी भारतीय सेना, पुलिस बल, और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पूरे सम्मान के साथ निभाई जाती है। यह पर्व उन्हें याद दिलाता है कि उनकी शक्ति का उपयोग धर्म की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिए होना चाहिए। सांची थाने में हुए इस आयोजन ने भी इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को बल दिया।

नगर में भी दिखा उत्साह: घर-घर में हुई शक्ति की आराधना

केवल पुलिस थाने तक ही यह उत्साह सीमित नहीं रहा। सांची नगर के अनेक जागरूक नागरिकों ने भी अपनी परंपरा का निर्वहन किया। परंपरागत रूप से अनेक घरों में लोगों ने अपने-अपने शस्त्रों (जिनमें पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र से लेकर आधुनिक हथियार, या यहां तक कि कार्य में उपयोग होने वाले औजार भी शामिल होते हैं) का पूजन किया। नागरिकों का यह उत्साह यह दर्शाता है कि यह पर्व समाज के हर वर्ग के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

इस दिन पूजन के बाद शक्ति प्रदर्शन (जैसे पारंपरिक युद्ध कला या निशानेबाजी) को भी शुभ माना जाता है। हालांकि, आज के समय में यह परंपरा प्रतीकात्मक रूप से अधिक निभाई जाती है, लेकिन इसका मूल भाव वही रहता है—शौर्य का सम्मान और आत्म-सुरक्षा का संकल्प।

दशहरे का शाश्वत संदेश: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है

दशहरा पर्व हर बार एक अटल सत्य को पुनर्जीवित करता है, जिसका उद्घोष सांची में हुए शस्त्र पूजन ने एक बार फिर कर दिया। वह शाश्वत संदेश है—"जहां धर्म है, वहीं विजय है।"

यह पंक्ति हमें बताती है कि विजय का मार्ग केवल शारीरिक बल या शस्त्रों की धार से नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा, नैतिक बल और न्याय के पथ पर चलने से खुलता है। प्रभु श्री राम की विजय इसीलिए महान है क्योंकि वह धर्म की स्थापना के लिए लड़ी गई थी।

सांची के इस ऐतिहासिक और पारंपरिक शस्त्र पूजन ने न सिर्फ नगर के शौर्य को सम्मान दिया है, बल्कि समूचे समाज को यह प्रेरणा भी दी है कि हमें अपनी आंतरिक शक्ति को सत्य और न्याय की रक्षा के लिए जागृत रखना चाहिए। यह पर्व केवल बुराई के पुतले जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के अज्ञान, आलस्य और असत्य को जलाकर एक नए, शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ जीवन की ओर बढ़ने का संकल्प है।

सांची का यह आयोजन एक बार फिर यह सिद्ध करता है कि हमारी परंपराएं कितनी जीवंत, शक्तिशाली और प्रासंगिक हैं।


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