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अहंकार छोड़ो, क्षमा अपनाओ: भोपाल में क्षमावाणी पर्व की धूम, मुनि श्री प्रमाण सागर ने दिया आत्मशुद्धि का संदेश

2025-09-10  Editor Shubham Jain  140 views

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भोपाल, अवधपुरी: आधुनिक युग को 'रिएक्शन' का युग बताते हुए, जैन मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने क्षमा के महत्व पर जोर दिया। रविवार, 14 सितंबर को पूरे भोपाल में होने वाले क्षमावाणी महोत्सव के अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि आज छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट जाते हैं और अहंकार हमें अंदर से खोखला कर रहा है। उन्होंने बताया कि लोग क्षमा मांगने को कमजोरी समझते हैं, जबकि असली साहस तो क्षमा करने में होता है।

आंतरिक सफाई का महापर्व

मुनि श्री प्रमाण सागर ने क्षमावाणी पर्व की तुलना दीपावली से करते हुए कहा, "जिस तरह हम दीपावली पर घर की सफाई करते हैं, उसी तरह क्षमावाणी पर्व आत्मा की सफाई का पर्व है।" उन्होंने 'मिच्छामी दुक्कड़म्' का गहरा अर्थ समझाया, जिसका मतलब है, "यदि मुझसे जाने-अनजाने कोई गलती, कटुता या ठेस पहुंची हो, तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ।" यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक संकल्प है जो हमारे मन को पवित्र करता है।

पूजा-पाठ से पहले मन की शुद्धि

मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि बाहरी पूजा-पाठ और व्रत-उपवास तब तक सार्थक नहीं हैं, जब तक हमारे भीतर काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी बुराइयां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि क्षमा करने और मांगने के लिए मन, वाणी और व्यवहार में पवित्रता बहुत जरूरी है। तन की गंदगी तो पानी से साफ हो सकती है, लेकिन मन की मैल को केवल द्वेष, वासना, लोभ, ईर्ष्या और छल-कपट से मुक्त होकर ही हटाया जा सकता है।

भावनायोग से बदलें जीवन

मुनि श्री ने "भावनायोग" का अभ्यास करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जैसा हम सोचते हैं, हमारा जीवन वैसा ही बनता है। मनोविज्ञान भी यही कहता है कि हम जो देखते, सुनते और महसूस करते हैं, वह सब हमारे अवचेतन मन में अंकित हो जाता है और यही हमारा चेतन मन को प्रभावित करता है। इसलिए, हमें मन को अपवित्र करने वाली चीजों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म केवल पवित्र हृदय में ही वास करता है, और मन की गंदगी धर्म की चमक को कम कर देती है। एक अपवित्र मन हमेशा लालसा और असंतोष से भरा होता है, जो दूसरों को सम्मान नहीं दे सकता।

आत्म-शुद्धि के लिए दोहराएं ये वाक्य

आत्म-शुद्धि के लिए मुनि श्री ने कुछ बोध वाक्यों को बार-बार दोहराने का सुझाव दिया: "मैं शुद्ध आत्मा हूँ," "मैं पवित्र आत्मा हूँ," "पवित्रता मेरा स्वभाव है, पवित्रता मेरा धर्म है।" उन्होंने कहा कि इन वाक्यों को दोहराने से हमारे भाव शुद्ध होते हैं।

मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि आगामी रविवार, 14 सितंबर को दोपहर 1:30 बजे से मुनिसंघ के सानिध्य में पूरे भोपाल के जैन समाज का क्षमावाणी पर्व आयोजित किया गया है। उन्होंने सभी से सपरिवार इस पावन पर्व में शामिल होने का अनुरोध किया।

यह पर्व न केवल जैन समाज के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि आज के दौर में क्षमा और प्रेम की कितनी आवश्यकता है।


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