
रिपोर्ट: सत्यम यादव, शमशाबाद
स्थान: पिपलधार, जिला विदिशा
पिपलधार के किसान सत्येंद्र यादव की कहानी, एक आम भारतीय किसान की असाधारण पीड़ा को उजागर करती है, जो आज भी व्यवस्था की उदासीनता और सरकारी तंत्र की बेरुख़ी से जूझ रहा है। मामला है शमशाबाद तहसील के ग्राम पिपलधार का, जहाँ संजय सागर बांध से निकली नहर की डी-1 माइनर, यादव के खेत से होकर गुजरी। इसी नहर की खुदाई के दौरान, उनकी 2 बीघा ज़मीन पर भारी मात्रा में मिट्टी डंप कर दी गई — और यह स्थिति पिछले 10 सालों से जस की तस बनी हुई है।
सरकारी कार्यालयों की चक्करघिन्नी में फंसा किसान
सत्येंद्र यादव की यह लड़ाई केवल खेत से मिट्टी हटवाने की नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान की भी है। उन्होंने पहले महानीम चौराहे पर जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर को आवेदन सौंपा। जब वहाँ कोई सुनवाई नहीं हुई तो वे विदिशा जिला मुख्यालय की जनसुनवाई में भी पहुँचे। लेकिन नतीजा वही "आवेदन ले लिया गया है" — और फिर फाइलों में गुम हो गया।
अधिकारियों की अनदेखी और जवाबदेही का अभाव
चौंकाने वाली बात यह है कि कलेक्टर द्वारा सिचाई विभाग को निर्देशित करने के बावजूद अब तक मिट्टी नहीं हटाई गई। सवाल उठता है – जब जिला कलेक्टर के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा, तो फिर इस तंत्र में किसान की आवाज़ कौन सुनेगा?
क्या यह सिचाई विभाग की लापरवाही है या पूरे सिस्टम का सुस्त रवैया? सत्येंद्र यादव का कहना है कि वे सीएम हेल्पलाइन 181 पर भी शिकायत दर्ज करा चुके हैं, लेकिन वहाँ से भी केवल शिकायत संख्या मिली — कार्रवाई नहीं।
खेत में फसल नहीं, मिट्टी के पहाड़
जहाँ कभी फसलें लहलहाती थीं, आज वहाँ केवल मिट्टी के ढेर नजर आते हैं। यादव बताते हैं कि वे न तो खेत जोत सकते हैं, न ही कोई फसल उगा सकते हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी प्रभावित हुई है, बल्कि उनका मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास भी डगमगाया है।
एक तरफ सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है, वहीं जमीनी हकीकत में 10 साल तक मिट्टी हटाने जैसी बुनियादी मांग भी पूरी नहीं हो पाती।
किसान की उम्मीद अब मीडिया से
थक-हारकर, अब सत्येंद्र यादव की आखिरी उम्मीद मीडिया से है। उनका मानना है कि जब सरकारी व्यवस्था ने उनकी बात नहीं सुनी, तो शायद जनचर्चा और मीडिया का दबाव इस सिस्टम को झकझोर सके।
उन्होंने स्पष्ट कहा — “सरकारी अफसर बस आवेदन ले लेते हैं, कार्रवाई किसी को नहीं करनी। अब मुझे लगता है कि मीडिया ही मेरी आखिरी उम्मीद है, शायद मेरी बात ऊपर तक पहुँच जाए और मेरा खेत फिर से फसल देने लगे।”